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Showing posts from August, 2021

कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं ! 10 May 2022

 कभी कभी घिर जाते हैं हम गहरे किसी दलदल में, फँस जाते हैं जिंदगी के चक्के किसी कीचड़ में, तब जिंदगी चलती भी है तो रेंगकर, लगता है सब रुका हुआ सा। बेहोशी में लगता है सब सही है, पता नहीं रहता अपने होने का भी, तब बेहोशी हमें पता नहीं लगने देती कि होश पूरा जा चुका है। ठीक भी है बेहोशी ना हो तो पता कैसे लगाइएगा की होश में रहना क्या होता है, विपरीत से ही दूसरे विपरीत को प्रकाश मिलता है अन्यथा महत्व क्या रह जायेगा किसी भी बात का फिर तो सही भी ना रहेगा गलत भी ना रहेगा सब शून्य रहेगा। बेहोशी भी रूकती नहीं हमेशा के लिए कभी आते हैं ऐसे क्षण भी जब एक दम से यूटूर्न मार जाती है आपकी नियति, आपको लगता है जैसे आँधी आयी कोई और उसने सब साफ कर दिया, बेहोशी गिर गयी धड़ाम से जमीन पर, आपसे अलग होकर। अभी आप देख पा रहे हो बाहर की चीजें साफ साफ, आपको दिख रहा है कि बेहोशी में जो कुछ चल रहा था वो मेरे भीतर कभी नही चला। जो भी था सब बाहर की बात थी, मैं तो बस भूल गया था खुद को बेहोशी में, ध्यान ना रहा था कि सब जो चल रहा था कोई स्वप्न था। खैर जो भी था सही था, जैसी प्रभु की इच्छा, जब मन किया ध्यान में डुबो दिया जब मन कि

छोड़कर भागने से पहले सोचना की शुरुआत कहाँ से हुई!

जब जब तुम खड़े हो किसी मोड़ पर, जब तुम्हारा मन तुम्हें चौराहा बनाकर हैरान कर दे। जब तुम्हें लगे कि मैं ठग लिया गया हूँ, जब तुम्हें अपने रास्ते के अलावा सारे रास्ते फायदेमंद लगें। जब तुम्हारा मन कहे कि बचा ले खुद को जितना बचा सके, वरना ठगी हो जाएगी तेरे साथ, जब तुम्हारे पांव उखड़ने लगें और घूमने लगें दूसरे रास्तों की ओर। तब बैठना कुछ क्षण, एक लंबी साँस लेना और धीरे धीरे छोड़ना, आँखें संसार से हटाकर लगा देना अपने अंदर, याद करना कि शुरू क्यों किया मैंने, क्या वजह रही जो मुझे चुनना पड़ा यह रास्ता? तब तुम जानोगे की यात्रा कितनी रोमांचक रही, तुम निकले ही यात्रा करने के लिए थे, फिर यह फ़ायदा नुकसान बीच में कब घुस गया? क्या अर्थ है इस बात का कि तुम चले किस राह पर, रास्ते चार हों या एक, सब एक जैसे ही तो हैं! यात्रा जारी है तुम्हारी, यही तो महत्वपूर्ण है चाहे रास्ता जो भी हो, जब तुम निकल आये इतने आगे तक किसी राह पर तो पार कर जाओ पूरा रास्ता एक बार, फिर चलना जिधर मन चाहे नए रास्ते पर, यों बार बार बीच रास्ते से भाग जाना तुम्हें भगौड़ा बना देगा। ये छोड़कर भागने की आदत घुस जायेगी तुम्हारी नस नस में, तुम भाग

मुसाफ़िर हूँ यारो ! विचार

ठहर जाओ ऐसे जैसे हमेशा से थे ही वहीं, गुजर जाओ ऐसे जैसे कभी वहाँ थे ही नहीं| ~ #ShubhankarThinks

विस्तार अगर हो तो वृक्ष जितना हो !

विस्तार वृक्ष जितना हो तो फिर ठीक है, वृक्ष की छाया रहती है सदा जैसे, दो चार लोग बैठे तो अच्छा लगता है उसे भी, मगर ऐसी कोई इच्छा भी नहीं कि कोई रहे पास हमेशा। ख़ुशी मिलती है उसे जब बच्चे खेलते हैं उसके अगल बगल में, ख़ूब झूमता है सब पत्तों को लेकर साथ में, जब कोई नहीं रहता तो उखड़ नहीं जाता है अपने स्थान से, व्याकुल नहीं होता है कि बच्चे आज खेलने नहीं आये, उसे तीव्र इच्छा नहीं होती कि उस पर समाज ध्यान दे कि वो सबको कितनी छाया शीतलता दे रहा है निःस्वार्थ भाव से। वो खड़े होकर चार लोगों से यह नहीं कहता कि मैं इतना विशाल हूँ,  इतनी गहरी जड़ें हैं, मेरी शाखा गगन चूम रही हैं। आपने सुना नहीं होगा किसी वृक्ष को यह कहते हुए की इस व्यक्ति को मैं छाया नहीं दूँगा इसने मेरी शाखा काट ली थी। द्वेष, घृणा उसने जाने ही नहीं कभी तभी तो इतना विशाल हो पाया, वरना रह जाता कहीं खरपतवार की भीड़ में,  जहाँ झुंड से होती उसकी पहचान। विस्तार हो तो वृक्ष जैसा करना,  वरना रखे रखना खुद को किसी सुंदर गमले में छाया ना सही कम से कम सुंदरता बढ़ा सकोगे किसी के घरौंदे की। मत बन जाना कोई बिन पत्तों का पेड़  जिस पर ना फल आये ना फूल आ