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Showing posts from August, 2021

मौसम बदले जीवन बदले, तुम फिर फिर अपने गीत सुनाना

जीवन है तो मौसम हैं, मरने के बाद बस एक मौसम रहेगा। फिर कभी नए नए मौसम देखने का मौका ना रहेगा। जीवन है तो आयेंगे उबासी भरे दिन, कभी बसंत महोत्सव कभी पतझड़ कभी बरसाती काली रातें। तुम चलते रहना अपनी राह, चाहे कोई भी हो। तुम बदल मत लेना चलने का ढ़ंग सिर्फ़ इसलिए  क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारे साथ गलत कर रही है। तुम रुक मत जाना देखकर कि कितना आसान है सब यहाँ, जहाँ तुम्हारे लिए सब कुछ उपलब्ध हो बिना किसी कठिनता के। तुम बहक मत जाना सुख देखकर, रखना याद की ये केवल एक मौसम है बदल जायेगा, तुम मन मत बना लेना सबसे कट जाने का इसलिए कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती हुई है, तुम ख़ुद से बचकर मत भागना इसलिए कि तुम में कमियाँ बहुत हैं। तुम कोई बोझ मत लाद लेना, अपने कंधे पर की तुम्हारे बिना ये सब काम कोई और ना करेगा। तुम होना खड़े किसी रास्ते पर, देखना ऊपर आसमान में और देखना फिर अपने शरीर को, कोई फ़र्क नहीं है तुम में और इस खुले आसमान में। तुम ऐसे चलना जैसे कोई राजा चलता है, ऐसे बोलना जैसे राजा बोलते हैं। तुम राजी मत हो जाना किसी के गुलाम बनने को, तुम देना सबको जितना दे सको, देखना मत मुड़कर पीछे की तरफ, राजा देते हैं

छोड़कर भागने से पहले सोचना की शुरुआत कहाँ से हुई!

जब जब तुम खड़े हो किसी मोड़ पर, जब तुम्हारा मन तुम्हें चौराहा बनाकर हैरान कर दे। जब तुम्हें लगे कि मैं ठग लिया गया हूँ, जब तुम्हें अपने रास्ते के अलावा सारे रास्ते फायदेमंद लगें। जब तुम्हारा मन कहे कि बचा ले खुद को जितना बचा सके, वरना ठगी हो जाएगी तेरे साथ, जब तुम्हारे पांव उखड़ने लगें और घूमने लगें दूसरे रास्तों की ओर। तब बैठना कुछ क्षण, एक लंबी साँस लेना और धीरे धीरे छोड़ना, आँखें संसार से हटाकर लगा देना अपने अंदर, याद करना कि शुरू क्यों किया मैंने, क्या वजह रही जो मुझे चुनना पड़ा यह रास्ता? तब तुम जानोगे की यात्रा कितनी रोमांचक रही, तुम निकले ही यात्रा करने के लिए थे, फिर यह फ़ायदा नुकसान बीच में कब घुस गया? क्या अर्थ है इस बात का कि तुम चले किस राह पर, रास्ते चार हों या एक, सब एक जैसे ही तो हैं! यात्रा जारी है तुम्हारी, यही तो महत्वपूर्ण है चाहे रास्ता जो भी हो, जब तुम निकल आये इतने आगे तक किसी राह पर तो पार कर जाओ पूरा रास्ता एक बार, फिर चलना जिधर मन चाहे नए रास्ते पर, यों बार बार बीच रास्ते से भाग जाना तुम्हें भगौड़ा बना देगा। ये छोड़कर भागने की आदत घुस जायेगी तुम्हारी नस नस में, तुम भाग

मुसाफ़िर हूँ यारो ! विचार

ठहर जाओ ऐसे जैसे हमेशा से थे ही वहीं, गुजर जाओ ऐसे जैसे कभी वहाँ थे ही नहीं| ~ #ShubhankarThinks

विस्तार अगर हो तो वृक्ष जितना हो !

विस्तार वृक्ष जितना हो तो फिर ठीक है, वृक्ष की छाया रहती है सदा जैसे, दो चार लोग बैठे तो अच्छा लगता है उसे भी, मगर ऐसी कोई इच्छा भी नहीं कि कोई रहे पास हमेशा। ख़ुशी मिलती है उसे जब बच्चे खेलते हैं उसके अगल बगल में, ख़ूब झूमता है सब पत्तों को लेकर साथ में, जब कोई नहीं रहता तो उखड़ नहीं जाता है अपने स्थान से, व्याकुल नहीं होता है कि बच्चे आज खेलने नहीं आये, उसे तीव्र इच्छा नहीं होती कि उस पर समाज ध्यान दे कि वो सबको कितनी छाया शीतलता दे रहा है निःस्वार्थ भाव से। वो खड़े होकर चार लोगों से यह नहीं कहता कि मैं इतना विशाल हूँ,  इतनी गहरी जड़ें हैं, मेरी शाखा गगन चूम रही हैं। आपने सुना नहीं होगा किसी वृक्ष को यह कहते हुए की इस व्यक्ति को मैं छाया नहीं दूँगा इसने मेरी शाखा काट ली थी। द्वेष, घृणा उसने जाने ही नहीं कभी तभी तो इतना विशाल हो पाया, वरना रह जाता कहीं खरपतवार की भीड़ में,  जहाँ झुंड से होती उसकी पहचान। विस्तार हो तो वृक्ष जैसा करना,  वरना रखे रखना खुद को किसी सुंदर गमले में छाया ना सही कम से कम सुंदरता बढ़ा सकोगे किसी के घरौंदे की। मत बन जाना कोई बिन पत्तों का पेड़  जिस पर ना फल आये ना फूल आ