Skip to main content

Posts

Showing posts from May, 2021

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा!

फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा,  जब आपको दो और दो चार कहने में हिचक नहीं होगी।  आप लंबी सांस भरके उन सबके मुँह पर कह दोगे कि,  पाँच और छः का नाटक आपको मुबारक, मैंने जाना है कि दो और दो चार होते हैं।  उस दिन आपको यह डर नहीं रहेगा कि अगर मैं अकेला पड़ गया तब क्या होगा,  तब आपको पहली बार दिखाई पड़ेगा कि आसमान इतना बड़ा कैसे है,  मेरी जहाँ तक नज़र है सब जगह दिखाई दे रहा है,  आप देखोगे कि कैसे सूरज डूब रहा है सचमुच में,  अब ये कोई सुनी हुई सौंदर्य कविता की बात नहीं रही।  आप जानोगे कि हवा दिखती नहीं है फिर भी गुजर रही है तुमसे छूकर,  आप देख पाओगे कि जरा सी हवा चलने पर नाचने लगते हैं पेडों पर लगे हुए पत्ते।  आप जानोगे की एकांत अब अकेलापन नहीं है,  मनुष्यों की भाषा के अलावा भी जीव जंतुओं की आवाजें शोर कर रही हैं,  अब आप जानोगे कि शांति प्रकृति में है ही नहीं  तो फिर उसे प्राप्त करने के प्रयास सब व्यर्थ ही हैं।  अब आप पाओगे कि एलईडी की रोशनी में सब चकाचौंध हो गया है,  इसलिए आप बत्ती बन्द करके देखने लगते हो चाँद और तारे।  एक दिन आप देखोगे सब वैसा, जैसा वो है,  आप पाओगे कुछ भी नहीं बदला मगर सब बदल गया। 

स्वतंत्र होने का एक और भ्रम ! विचार

 किसी विचार को मानने के बाद, किसी व्यक्ति के साथ पूर्ण सहमति होने के बाद अथवा किसी धर्म को मानने के बाद मिली परम स्वतंत्रता भी खूंटे से बँधी लंबी रस्सी में जकड़ी हुई आज़ादी है। आपको यह भ्रम हो सकता है कि आप पूर्ण आज़ाद हो गए हो आपको खूंटी के चारों तरफ गोल गोल घूमकर पूरा विश्व दिखाई दे सकता है, मगर आपकी सोच का दायरा उस खूँटी से बाहर नहीं जा  सकता है। खूँटी वास्तव में है नहीं आपने यह माना ही हुआ है कि आप खूँटी से बंधे हुए हो, आप इतने लाचार हैं कि स्वंय को बिना बांधे रह नहीं पाते हो।  स्वयं को परतन्त्र बनाने के लिए अनेकों मार्ग खोज रखे हैं, एक भ्रम के अंदर दूसरा भ्रम आप पूरा मैट्रिक्स बनाकर खुद को फंसाये हुए हो। ~ #ShubhankarThinks