Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2021

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

पौधे पर फूलों का ना खिलना

जैसे किसी बाग में पौधों पर फूल ना खिल सकें तो हवा, पानी, खाद, बीज कई कारण हो सकते हैं परंतु इन सबमें से मुख्य कारण माली का सजग ना होना माना जायेगा, ऐसे ही अगर किसी बच्चे के चेहरे पर अगर फूल ना खिल रहे हों, उसके भीतर से ऊर्जा उछाल नहीं मार रही तो इसका पूरा दोष माता पिता को दिया जाना चाहिए। ~ #ShubhankarThinks

रस कोई निर्झर बह रहा है

रस कोई रग-रग से निर्झर बह रहा है, उद्गम से अनभिज्ञ फिर भी चित्त शांत रह रहा है। हैं जो अनगिनत प्राचीर दिन दिन गिर रही हैं, कुछ अध गिरी दीवार पर से बह रहा है। कल तक भू गर्भ में विस्मृत फंसा था, वो बीज अब बाहें फैलाए बढ़ रहा है। किए गए थे आयोजन जिस घोंसले में, आज वो घर चहचहाहट से भर रहा है। नाचता है रोम रोम संगीत धुन पर, गीत कोई प्रकृति में बज रहा है। किन्हीं संकरे पर्वत के दल में, जैसे बह रहा जल, कल कल के क्रम में, ऐसा कोई नाद मन में हो रहा है। कुछ रह रहा है शेष फिर भी, शेष सब में खो रहा है, है कोई दलदल भी भीतर, "मैं" वहीं कहीं धंस रहा है, बस रहा सब कुछ ही भीतर, कुछ रोज रोज खो रहा है। ~ #ShubhankarThinks

लोग जी कम रहे हैं, बता ज्यादा रहे हैं

 लोग ज़िंदा हैं ऐसे जैसे एहसान जता रहे हैं, जी कम रहे हैं, सबको बता ज्यादा रहे हैं। उधारी में लेते हैं सांस भी सोच समझकर, जैसे बची हुई सांसों से किश्त पटा रहे हैं। ख़ुशी के लिए किए बैठे हैं, हसरतों की डाउनपेमेंट, पजेशन के लिए कमबख्त हंसी बचा रहे हैं। दो तीन की गिनती में बुरे फंस गए हैं, ख़ुद के गणित में ही ख़ुद को फंसा रहे हैं। जी रहे हैं दस प्रतिशत बड़े रूखे हुए मन से, बाकी नब्बे प्रतिशत बच्चों के लिए बचा रहे हैं। गले में कुछ भी फांस लेना प्रथा बन गई है, आंखें मूंदकर सभी ये किए जा रहे हैं। दुख में रहना एक बहादुरी का काम है, घूंट घूंट इस जहर को पिए जा रहे हैं। मूल काट रहे हैं थोड़ा थोड़ा करके, लोग पत्तों की सजावट में जान लगा रहे हैं। लोग जी कम रहे हैं, दिखा ज्यादा रहे हैं।। ~ #ShubhankarThinks