Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2021

कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं ! 10 May 2022

 कभी कभी घिर जाते हैं हम गहरे किसी दलदल में, फँस जाते हैं जिंदगी के चक्के किसी कीचड़ में, तब जिंदगी चलती भी है तो रेंगकर, लगता है सब रुका हुआ सा। बेहोशी में लगता है सब सही है, पता नहीं रहता अपने होने का भी, तब बेहोशी हमें पता नहीं लगने देती कि होश पूरा जा चुका है। ठीक भी है बेहोशी ना हो तो पता कैसे लगाइएगा की होश में रहना क्या होता है, विपरीत से ही दूसरे विपरीत को प्रकाश मिलता है अन्यथा महत्व क्या रह जायेगा किसी भी बात का फिर तो सही भी ना रहेगा गलत भी ना रहेगा सब शून्य रहेगा। बेहोशी भी रूकती नहीं हमेशा के लिए कभी आते हैं ऐसे क्षण भी जब एक दम से यूटूर्न मार जाती है आपकी नियति, आपको लगता है जैसे आँधी आयी कोई और उसने सब साफ कर दिया, बेहोशी गिर गयी धड़ाम से जमीन पर, आपसे अलग होकर। अभी आप देख पा रहे हो बाहर की चीजें साफ साफ, आपको दिख रहा है कि बेहोशी में जो कुछ चल रहा था वो मेरे भीतर कभी नही चला। जो भी था सब बाहर की बात थी, मैं तो बस भूल गया था खुद को बेहोशी में, ध्यान ना रहा था कि सब जो चल रहा था कोई स्वप्न था। खैर जो भी था सही था, जैसी प्रभु की इच्छा, जब मन किया ध्यान में डुबो दिया जब मन कि

पौधे पर फूलों का ना खिलना

जैसे किसी बाग में पौधों पर फूल ना खिल सकें तो हवा, पानी, खाद, बीज कई कारण हो सकते हैं परंतु इन सबमें से मुख्य कारण माली का सजग ना होना माना जायेगा, ऐसे ही अगर किसी बच्चे के चेहरे पर अगर फूल ना खिल रहे हों, उसके भीतर से ऊर्जा उछाल नहीं मार रही तो इसका पूरा दोष माता पिता को दिया जाना चाहिए। ~ #ShubhankarThinks

रस कोई निर्झर बह रहा है

रस कोई रग-रग से निर्झर बह रहा है, उद्गम से अनभिज्ञ फिर भी चित्त शांत रह रहा है। हैं जो अनगिनत प्राचीर दिन दिन गिर रही हैं, कुछ अध गिरी दीवार पर से बह रहा है। कल तक भू गर्भ में विस्मृत फंसा था, वो बीज अब बाहें फैलाए बढ़ रहा है। किए गए थे आयोजन जिस घोंसले में, आज वो घर चहचहाहट से भर रहा है। नाचता है रोम रोम संगीत धुन पर, गीत कोई प्रकृति में बज रहा है। किन्हीं संकरे पर्वत के दल में, जैसे बह रहा जल, कल कल के क्रम में, ऐसा कोई नाद मन में हो रहा है। कुछ रह रहा है शेष फिर भी, शेष सब में खो रहा है, है कोई दलदल भी भीतर, "मैं" वहीं कहीं धंस रहा है, बस रहा सब कुछ ही भीतर, कुछ रोज रोज खो रहा है। ~ #ShubhankarThinks

लोग जी कम रहे हैं, बता ज्यादा रहे हैं

 लोग ज़िंदा हैं ऐसे जैसे एहसान जता रहे हैं, जी कम रहे हैं, सबको बता ज्यादा रहे हैं। उधारी में लेते हैं सांस भी सोच समझकर, जैसे बची हुई सांसों से किश्त पटा रहे हैं। ख़ुशी के लिए किए बैठे हैं, हसरतों की डाउनपेमेंट, पजेशन के लिए कमबख्त हंसी बचा रहे हैं। दो तीन की गिनती में बुरे फंस गए हैं, ख़ुद के गणित में ही ख़ुद को फंसा रहे हैं। जी रहे हैं दस प्रतिशत बड़े रूखे हुए मन से, बाकी नब्बे प्रतिशत बच्चों के लिए बचा रहे हैं। गले में कुछ भी फांस लेना प्रथा बन गई है, आंखें मूंदकर सभी ये किए जा रहे हैं। दुख में रहना एक बहादुरी का काम है, घूंट घूंट इस जहर को पिए जा रहे हैं। मूल काट रहे हैं थोड़ा थोड़ा करके, लोग पत्तों की सजावट में जान लगा रहे हैं। लोग जी कम रहे हैं, दिखा ज्यादा रहे हैं।। ~ #ShubhankarThinks