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Showing posts from April, 2020

कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं ! 10 May 2022

 कभी कभी घिर जाते हैं हम गहरे किसी दलदल में, फँस जाते हैं जिंदगी के चक्के किसी कीचड़ में, तब जिंदगी चलती भी है तो रेंगकर, लगता है सब रुका हुआ सा। बेहोशी में लगता है सब सही है, पता नहीं रहता अपने होने का भी, तब बेहोशी हमें पता नहीं लगने देती कि होश पूरा जा चुका है। ठीक भी है बेहोशी ना हो तो पता कैसे लगाइएगा की होश में रहना क्या होता है, विपरीत से ही दूसरे विपरीत को प्रकाश मिलता है अन्यथा महत्व क्या रह जायेगा किसी भी बात का फिर तो सही भी ना रहेगा गलत भी ना रहेगा सब शून्य रहेगा। बेहोशी भी रूकती नहीं हमेशा के लिए कभी आते हैं ऐसे क्षण भी जब एक दम से यूटूर्न मार जाती है आपकी नियति, आपको लगता है जैसे आँधी आयी कोई और उसने सब साफ कर दिया, बेहोशी गिर गयी धड़ाम से जमीन पर, आपसे अलग होकर। अभी आप देख पा रहे हो बाहर की चीजें साफ साफ, आपको दिख रहा है कि बेहोशी में जो कुछ चल रहा था वो मेरे भीतर कभी नही चला। जो भी था सब बाहर की बात थी, मैं तो बस भूल गया था खुद को बेहोशी में, ध्यान ना रहा था कि सब जो चल रहा था कोई स्वप्न था। खैर जो भी था सही था, जैसी प्रभु की इच्छा, जब मन किया ध्यान में डुबो दिया जब मन कि

प्रश्न यह की कौन हूं मैं?

प्रश्न यह की कौन हूं मैं? सब घट रहा है फिर भी मौन हूं मैं! श्वास श्वास घट रहा हूं, सूक्ष्म रूप रख रहा हूं। आधार मेरा सत्य है, असत्य में भी बस रहा हूं। यह देह मेरी मर्त्य है, अनन्त यह चेतनतत्तव है! मैं ही ब्रह्म हूं, मैं ही बिंदु हूं, तम भी मैं, उदगम भी मैं, विच्छेद मुझ से, संगम भी मैं। मैं सृष्टि हूं, नक्षत्र हूं, मृत्यु भी मैं, मैं ही जीवत्व हूं, आकाश में, पाताल में, भूलोक में, जलताल में, उपस्थिति मेरी यत्र तत्र है, मैं सर्वत्र हूं। प्रौढ़ मैं, यौवन भी मैं! मैं बाल हूं, मैं वृद्ध हूं| मैं योग हूं, मैं ही काम में, मैं प्रेम हूं, मैं ही क्रुद्ध हूं, भ्रमित ना हो किसी नाम में, हूं अधीर मैं, मैं ही संतुष्ट हूं। निर्मल भी मैं, मैं ही अशुद्ध हूं, मैं शीत हूं, मैं ही रुद्र हूं। मैं शून्य हूं, मैं क्षुद्र हूं, मैं मौन हूं, मैं गौण हूं, प्रश्न यह की कौन हूं मैं? - #ShubhankarThinks

हम सब रेत कि तरह हैं

हम सब रेत कि तरह हैं, जो वक़्त के साथ ढल कर कुछ भी बन जाते हैं। और अगर कोई हवा का झोंका उसका आकार बिगाड़ गया तो दुबारा पहले की तरह नहीं बन पाते, हर बार किसी नई आकृति में ढल जाते हैं। और जब किसी आकृति में ढलने कि अवस्था नहीं रह जाती तो उड़ जाते हैं हवा के किसी झोंका के साथ ही। हम सब रेत कि तरह हैं। ~#ShubhankarThinks

देह का प्रतिद्वंद्व

कुछ वक्तव्य हैं जो नि:शब्द हैं, रोचक शब्द हैं वो नेपथ्य में, मार्गों में भटकता रक्त है, श्वास भी पथ भ्रष्ट है। मद पान में सम्मिलित अधर हैं, रोमांचित हो रहे शिखर हैं। नव स्वप्न मन में उग रहे हैं, रोम छिद्र चुभ रहे हैं। मुख रुधिर वर्ण में ढल गए हैं, कंपित हृदय भी जल रहे हैं। देह के इस प्रतिद्वंद्व में, विस्मृत हुए सभी छंद हैं। #Erotica #ShubhankarThinks

जिन्दगी चल रही है

कुछ समतल नहीं है, जिंदगी चल रही है। कहीं ये उछल रही है, कहीं ये ढल रही है। जिन्दगी उछल रही है और चल रही है, जहां पर ढल रही है वहां भी चल रही है। कभी ये फल रही है, कभी ये जल रही है। कभी सफल रही है कभी विफल रही है, तब भी जिन्दगी चल रही है। कुछ निश्चित नहीं है, भय किंचित नहीं है, भले ठोकर लगी हैं पथ से भ्रमित नहीं है। बुरी हो या अच्छी हर घड़ी ढल रही है, बस जिंदगी चल रही है। #ShubhankarThinks