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Showing posts from February, 2020

मौसम बदले जीवन बदले, तुम फिर फिर अपने गीत सुनाना

जीवन है तो मौसम हैं, मरने के बाद बस एक मौसम रहेगा। फिर कभी नए नए मौसम देखने का मौका ना रहेगा। जीवन है तो आयेंगे उबासी भरे दिन, कभी बसंत महोत्सव कभी पतझड़ कभी बरसाती काली रातें। तुम चलते रहना अपनी राह, चाहे कोई भी हो। तुम बदल मत लेना चलने का ढ़ंग सिर्फ़ इसलिए  क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारे साथ गलत कर रही है। तुम रुक मत जाना देखकर कि कितना आसान है सब यहाँ, जहाँ तुम्हारे लिए सब कुछ उपलब्ध हो बिना किसी कठिनता के। तुम बहक मत जाना सुख देखकर, रखना याद की ये केवल एक मौसम है बदल जायेगा, तुम मन मत बना लेना सबसे कट जाने का इसलिए कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती हुई है, तुम ख़ुद से बचकर मत भागना इसलिए कि तुम में कमियाँ बहुत हैं। तुम कोई बोझ मत लाद लेना, अपने कंधे पर की तुम्हारे बिना ये सब काम कोई और ना करेगा। तुम होना खड़े किसी रास्ते पर, देखना ऊपर आसमान में और देखना फिर अपने शरीर को, कोई फ़र्क नहीं है तुम में और इस खुले आसमान में। तुम ऐसे चलना जैसे कोई राजा चलता है, ऐसे बोलना जैसे राजा बोलते हैं। तुम राजी मत हो जाना किसी के गुलाम बनने को, तुम देना सबको जितना दे सको, देखना मत मुड़कर पीछे की तरफ, राजा देते हैं

शहर में बहुत भीड़ है

कहने के लिए कह लो की सड़कों पर अंधी भीड़ है, चलते फिरते हांड मांस और कुछ अधमरे से शरीर हैं, कुछ गोरी चमड़ी में क़ैद मनगढ़ंत अमीर हैं, कुछ काली चमड़ी वाले जगजाहिर फकीर हैं। कुछ सम्पन्न ढांचे जिनके पास दिमाग नहीं बस शरीर हैं, कुछ लुटे हुए कंकाल जिनके पास मरे हुए जमीर हैं। बस कहने के लिए कह लो कि शहर में बहु भीड़ है। ~ #ShubhankarThinks

पथ भ्रष्ट हैं इसलिए कष्ट हैं

क्यों पस्त हैं, क्या कष्ट है? किस अंधेर का आसक्त है। क्यों पस्त है कुछ बोल तू, अगर कष्ट में तो बोल तू, क्यों लड़ रहा हूं खुद से ही, ज़ुबान है तेरी भी, खोल तू। क्यों भ्रष्ट हैं, वो मस्त हैं, वो निगल रहे हैं सारा देश! हम कष्ट में, पथ भ्रष्ट हैं, नहीं बच रहा है कुछ भी शेष। वो भ्रष्ट हैं क्योंकि हम कष्ट में, वो मस्त हैं क्योंकि ख़ुद हम भ्रष्ट हैं। जो सख़्त हैं वो लड़ रहे हैं, जो कष्ट में भी बढ़ रहे हैं! जो कष्ट में भी सख़्त हैं, जो सख़्त हैं, वो समृद्ध हैं। क्यों हतप्रभ है, किसी समृद्ध से, तेरे भी हस्त हैं, चला इन्हें शस्त्र से! तेरे पास वक़्त है, तेरे पास शस्त्र हैं, फ़िर क्यों तू स्तब्ध है, यूं कष्ट में? क्यों निर्वस्त्र है अगर वस्त्र हैं, क्यों चल रहा ये नग्न भेष, अगर निर्वस्त्र ज्यादा सभ्य है, तो मत कहो कि मानव है विशेष। कहो जीव सारे सभ्य हैं, वो सब भी तो निर्वस्त्र हैं| सब निर्वस्त्र ही समृद्ध थे, तो कोई लाया ही क्यों ये वस्त्र है। अब ये वस्त्र हैं तो बढ़ा कष्ट है, कोई सभ्य है तो कोई निर्वस्त्र है। कुछ कटु सत्य हैं,