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Showing posts from February, 2020

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

शहर में बहुत भीड़ है

कहने के लिए कह लो की सड़कों पर अंधी भीड़ है, चलते फिरते हांड मांस और कुछ अधमरे से शरीर हैं, कुछ गोरी चमड़ी में क़ैद मनगढ़ंत अमीर हैं, कुछ काली चमड़ी वाले जगजाहिर फकीर हैं। कुछ सम्पन्न ढांचे जिनके पास दिमाग नहीं बस शरीर हैं, कुछ लुटे हुए कंकाल जिनके पास मरे हुए जमीर हैं। बस कहने के लिए कह लो कि शहर में बहु भीड़ है। ~ #ShubhankarThinks

पथ भ्रष्ट हैं इसलिए कष्ट हैं

क्यों पस्त हैं, क्या कष्ट है? किस अंधेर का आसक्त है। क्यों पस्त है कुछ बोल तू, अगर कष्ट में तो बोल तू, क्यों लड़ रहा हूं खुद से ही, ज़ुबान है तेरी भी, खोल तू। क्यों भ्रष्ट हैं, वो मस्त हैं, वो निगल रहे हैं सारा देश! हम कष्ट में, पथ भ्रष्ट हैं, नहीं बच रहा है कुछ भी शेष। वो भ्रष्ट हैं क्योंकि हम कष्ट में, वो मस्त हैं क्योंकि ख़ुद हम भ्रष्ट हैं। जो सख़्त हैं वो लड़ रहे हैं, जो कष्ट में भी बढ़ रहे हैं! जो कष्ट में भी सख़्त हैं, जो सख़्त हैं, वो समृद्ध हैं। क्यों हतप्रभ है, किसी समृद्ध से, तेरे भी हस्त हैं, चला इन्हें शस्त्र से! तेरे पास वक़्त है, तेरे पास शस्त्र हैं, फ़िर क्यों तू स्तब्ध है, यूं कष्ट में? क्यों निर्वस्त्र है अगर वस्त्र हैं, क्यों चल रहा ये नग्न भेष, अगर निर्वस्त्र ज्यादा सभ्य है, तो मत कहो कि मानव है विशेष। कहो जीव सारे सभ्य हैं, वो सब भी तो निर्वस्त्र हैं| सब निर्वस्त्र ही समृद्ध थे, तो कोई लाया ही क्यों ये वस्त्र है। अब ये वस्त्र हैं तो बढ़ा कष्ट है, कोई सभ्य है तो कोई निर्वस्त्र है। कुछ कटु सत्य हैं,