Skip to main content

Posts

Showing posts from January, 2020

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

जो जल रहा है वही चल रहा है

जो जल रहा है वही चल रहा है, जो जल रहा है चल रहा है! वक़्त के साथ ढल रहा है, जो जल रहा है ढल रहा है, वही आज तक सफल रहा है| जो सफल रहा है वो सरल रहा है! जो सरल रहा है, शीतल रहा है, मार्ग पर अविरल रहा है, आकार जो बदल रहा है वही तो जल रहा है। जो जल रहा है वो निर्मल रहा है, जो जल गया है वो दलदल रहा है। जो जल गया है वो ना बदल रहा है जो ना बदल रहा है वो ना कल रहा है जो आज जल रहा है वो ही कल रहा है। जो जल रहा है वही चल रहा है। ~ ShubhankarThinks