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Showing posts from November, 2019

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

बातों में अब सरलता नहीं है

बेशक पढ़ लिए हैं वो इल्मी किताबें बहुतायत में, क्या फ़ायदा गर बातों में अब भी सरलता नहीं है| कोशिश कर रहा है इन्सां पैरों से आसमाँ तक चढ़ने की, बिना पर की पैदाइश है इसलिए कोई सफलता नहीं है| पड़ती है तो पड़ जाने दो किसी पर मार वक़्त की, ठोकर खाने से पहले कोई भी संभलता नहीं है| मत करो गुज़ारिश किसी से बदल जाने की, बिना खुदगर्ज़ी कोई यूँ ही बदलता नहीं है| कुछ लोग रहते हैं ऐसे गुमान में अपने, जिन्हें लगता है की सूरज कभी ढ़लता नहीं है| तुम अकेले चलो, किसी को खींचा मत करो साथ में, ऐसे जबरदस्ती कोई किसी के भी साथ चलता नहीं है| थम जाता है सब कुछ मुश्क़िल घड़ी में, तब वक़्त का आँकड़ा भी ठीक से चलता नहीं| कुछ लोग अँधेरे में बेवज़ह इतने हताश हुए जाते हैं, क्यों लग रहा है उनको कि कभी दिन निकलता नहीं है| #ShubhankarThinks

दीपवाली

रौनकें शहर में हुई हैं अच्छा ही हुआ, कुछ खुशदिली भी होती तो क्या बात होती। भर गया फोन मेरा लोगों के संदेशों से, बधाइयां मिलकर देते सब तो क्या बात होती। मोहल्ला चमक गया है पूरा बनावटी लाइट से, उजाले मन में भी होते तो क्या बात होती। घरों पर लद गए हैं फूल किलो की मात्रा में, कुछ खूबसूरती दिलों में भी होती तो क्या बात होती। मिठाई बांटी गई हैं खूब इस घर से उस घर तक, कुछ मिठास रिश्तोें में भी लाते तो क्या बात होती। पैसे बहाये गए हैं खूब अपने घर त्योहार मनाने में, कुछ गरीबों को भी देते तो उनकी दीपावली होती। #ShubhankarThinks