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Showing posts from November, 2019

प्रेम लिखने जितना सरल विषय नहीं है! कविता

 प्रेम को जितना भी जाना गया वो बहुत कम जाना गया, प्रेम को किया कम लोगों ने और लिखा ज्यादा गया। ख़ुशी मिली तो लिख दिया बढ़ा चढ़ाकर, मिले ग़म तो बना दिया बीमारी बनाकर। किसी ने बेमन से ही  लिख दी दो चार पंक्ति शौकिया तौर पर, कोई शुरुआत पर ही लिखता रहा डुबा डुबा कर। कुछ लगे लोग प्रेम करने ताकि लिखना सीख जाएं, फ़िर वो लिखने में इतने व्यस्त कि भूल गए उसे यथार्थ में उतारना! हैं बहुत कम लोग जो ना बोलते हैं, ना कुछ लिखते हैं उनके पास समय ही नहीं लिखने के लिए, वो डूबे हैं प्रेम में पूरे के पूरे। वो जानते हैं की यह लिखने जितना सरल विषय है ही नहीं इसलिए वो बिना समय व्यर्थ किए कर रहे हैं उस हर पल जीने की। उन्हें दिखाने बताने, समझाने जैसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं दिखती,वो ख़ुद पूरे के पूरे प्रमाण हैं,  उनका एक एक अंश इतना पुलकित होगा कि संपर्क में आया प्रत्येक व्यक्ति उस उत्सव में शामिल हुए बिना नहीं रह पायेगा। वो चलते फिरते बस बांट रहे होंगे, रस ही रस।  ~ #ShubhankarThinks

बातों में अब सरलता नहीं है

बेशक पढ़ लिए हैं वो इल्मी किताबें बहुतायत में, क्या फ़ायदा गर बातों में अब भी सरलता नहीं है| कोशिश कर रहा है इन्सां पैरों से आसमाँ तक चढ़ने की, बिना पर की पैदाइश है इसलिए कोई सफलता नहीं है| पड़ती है तो पड़ जाने दो किसी पर मार वक़्त की, ठोकर खाने से पहले कोई भी संभलता नहीं है| मत करो गुज़ारिश किसी से बदल जाने की, बिना खुदगर्ज़ी कोई यूँ ही बदलता नहीं है| कुछ लोग रहते हैं ऐसे गुमान में अपने, जिन्हें लगता है की सूरज कभी ढ़लता नहीं है| तुम अकेले चलो, किसी को खींचा मत करो साथ में, ऐसे जबरदस्ती कोई किसी के भी साथ चलता नहीं है| थम जाता है सब कुछ मुश्क़िल घड़ी में, तब वक़्त का आँकड़ा भी ठीक से चलता नहीं| कुछ लोग अँधेरे में बेवज़ह इतने हताश हुए जाते हैं, क्यों लग रहा है उनको कि कभी दिन निकलता नहीं है| #ShubhankarThinks

दीपवाली

रौनकें शहर में हुई हैं अच्छा ही हुआ, कुछ खुशदिली भी होती तो क्या बात होती। भर गया फोन मेरा लोगों के संदेशों से, बधाइयां मिलकर देते सब तो क्या बात होती। मोहल्ला चमक गया है पूरा बनावटी लाइट से, उजाले मन में भी होते तो क्या बात होती। घरों पर लद गए हैं फूल किलो की मात्रा में, कुछ खूबसूरती दिलों में भी होती तो क्या बात होती। मिठाई बांटी गई हैं खूब इस घर से उस घर तक, कुछ मिठास रिश्तोें में भी लाते तो क्या बात होती। पैसे बहाये गए हैं खूब अपने घर त्योहार मनाने में, कुछ गरीबों को भी देते तो उनकी दीपावली होती। #ShubhankarThinks