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जब आप जिंदगी के किसी मोड़ पर लगातार असफल हो रहे हो तो आपके पास दो रास्ते हैं-
पहला रास्ता यह है, कि आप यहीं रुक जाओ और आने वाली पीढ़ी को यहाँ रुकने के बहाने गिनाओ !
दूसरा यह है, कि आप लगातार प्रयास करते रहो और इतने आगे बढ़ जाओ और खुद किसी का प्रेरणास्रोत बन जाओ|

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Wednesday, August 15, 2018

Independence Day Special: मानसिक गुलामी से आजादी कैसे पायें?

नमस्कार दोस्तों आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें| आजादी के पर्व के इस पावन मौके पर मानसिक गुलामी से आजादी के विषय में कुछ विचार आप सभी के समक्ष रखने जा रहा हूँ| आशा है आप समय देकर पढ़ेंगे|







प्रस्तावना -

                          15 अगस्त 1947 यह तिथि सभी को अच्छे से याद है क्योंकि इस दिन लगभग 800 वर्षों की गुलामी झेल रहे भारत को पूर्ण रूप से आजादी मिली थी| उस दिन से आज तक हम प्रतिवर्ष यह उत्सव के रूप में मनाते हैं और वीर अमर शहीदों को नमन करते हैं| इन सबके बीच भारत ने एक लम्बा सफर तय किया, जिसमें हमने बहुत सारे क्षेत्रों में तरक्की हांसिल की मगर कुछ बातों में हम पहले से भी ज्यादा पिछड़ गए| वह हैं भाईचारा, रिश्ते नाते निभाना या फिर इंसानियत के मायने हों, इन सब में हम कहीं पीछे खड़े हैं| खैर आज इस विषय पर चर्चा नहीं होगी| आज हम चर्चा करेंगे वर्तमान समय में आजादी के मायनों की और किस तरह की आजादी से हम दूर हो चुके हैं|




मेरे अनुसार आजादी की परिभाषा-


वर्तमान समय की दृष्टि से आजादी का तात्पर्य हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाना नहीं है| भारतीय संविधान के अनुसार सभी को स्वतंत्रता मिली हुई है| आज हमें बौद्धिक, वैचारिक और मानसिक गुलामी से आजादी लेने की आवश्यकता है| यह आजादी हमें कोई दूसरा नहीं दे सकता है, हमने खुद को अपनी आदतों से अपनी छोटी समझ और गलत माध्यमों से खुद को किसी और व्यक्ति का गुलाम बना लिया है| यह व्यक्ति कोई भी हो सकता है, यह आपका प्रिय अभिनेता, नेता अथवा कोई दोस्त हो सकता है| कमाल की बात यह है की इस स्थिति में आपको पता नहीं चलता की आप गुलामी कर रहे हैं|



आखिर ऐसी मानसिक गुलामी की शुरुआत कहाँ से हुई?


  • जब भारत में अलग अलग देशों से आक्रमण हो रहे थे और हमारे आपसी भेदभाव के चलते भारत पूरा गुलाम बनता जा रहा था| ऐसे में पूरे 600-800 वर्षों चले इस दौर में भारत की वो विशिष्ट और उत्तम सोचने वाली रक्त कोशिकाओं का अन्दर तक समापन हो चुका था| ऐसे समय पर कुछ ज्ञानी, विद्वान् बचे हुए थे, जो सबसे थोड़ा अलग सोचने में विश्वास रखते थे| ऐसे लोगों ने गुलामी से बाहर आने के लिये, अपने आस पास के लोगों को अपने विचारों से मानसिक रूप से मरे हुए गुलामों को अपने प्रभाव में किया और उन्हें याद दिलाया की भारत हमारा देश है| हम किसी के नौकर नहीं हैं, ये अंग्रेज लोग बाहरी लोग हैं|उस समय अधिकांश लोग अंग्रेजों के यहाँ नौकरी करके मानसिक रूप से उनके पूर्णतयः गुलाम बन चुके थे| ऐसे में हमारे कुछ विशेष नेता लोगों के प्रयासों के चलते लोगों का मानसिक परिवर्तन किया गया और उन्हें आजादी की लड़ाई में जाने के लिए प्रेरित किया और यह सब होने के 20-30 साल से भी ज्यादा समय लगा| देश आजाद हुआ और अब देश में अनेकों नेता उभरकर आये|
  • ऐसे में एक बात सामने आयी, किसी समय पर जगतगुरु कहलाने वाला भारत अब गरीब, अनपढ़ लोगों की एक सँख्या मात्र था| वह भारत जिसने कुछ सौ या हजार नेताओं के नेतृत्व और बलिदान के चलते स्वतंत्रता हासिल कर ली थी| मगर मानसिक रूप से हमें आदत पड़ चुकी थी की हमें निर्देश देने के लिए अथवा हमारे मानसिक विचारों को चलाने के लिए हमेशा किसी व्यक्ति की आवश्यकता होगी| मैं किसी नेता को गलत नहीं कहूँगा या फिर किसी को इसके लिए दोष नहीं दूँगा मगर आजाद भारत की जनता अब उन सभी की इतनी कृतज्ञ बन चुकी थी| उनकी बातों को , उनके फैसलों को पत्थर की लकीर मान लिया गया|

    Credit-


हमारी भूल और कुछ भ्रान्तियाँ-

सभी भूल गए की वह हमारे बीच से निकलकर उभरे हैं| हर व्यक्ति की सोचने की क्षमता अलग होती है, सबके विचार अलग होते हैं इसका प्रमाण हमारी आजादी की लड़ाई थी| जिसमें दो तरह के लोग थे, एक वह थे जो हिंसा करके आजादी प्राप्त करने में विश्वास रखते थे, दूसरे थे अहिंसा के पुजारी| दोनों दलों में एक समानता थी की दोनों एक ही लक्ष्य की प्राप्ति में लगे हुए थे मगर दोनों के विचार बिल्कुल अलग थे| मगर भारत में अंधभक्ति जैसी बीमारी का जन्म उसी समय से हुआ| हमारी नासमझ जनता अलग अलग दल से जुड़ गयी और एक दूसरे को दुश्मन समझने लगी| जबकि उनके शीर्ष नेता एक दूसरे का आदर सम्मान करते थे|
आजाद के बाद भी इसका पूरा प्रभाव देखने को मिला| अब लोग अपने विचार से सोचने समझने की क्षमता खो चुके थे| धीरे धीरे समय बदला पढ़े लिखे लोगों की संख्या बढ़ी और देश ने नए आयाम छूना शुरू किया| मगर मानसिक, बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर हम लोग गुलाम बने रहे| भारत की जनसँख्या के साथ गुलामों की सँख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है|



आजादी की वर्तमान स्थिति -


आजादी अब एक त्यौहार बन चुकी है| जो प्रतिवर्ष 15 अगस्त के दिन हमारे फोन के डीपी और तिरंगा फहराने के बाद शाम तक ढल जाती है| यह सवाल बहुत कम लोग अपने आप से करते होंगे की क्या आजाद हूँ मैं? क्या मैं मानसिक, वैचारिक रूप से स्वतंत्रत हूँ| आज हम किसी ना किसी राजनैतिक दल के चश्मे पहनकर घटनाओं को देखना और आँकना शुरू करते हैं| इसे धर्मान्धता कहना उचित होगा, जब हम अपने धर्म को सर्वोपरि मानकर हमारे धर्म के व्यक्ति का बचाव करने के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| यह निर्णय, यह विचार , यह सोच आपकी नहीं है! यह कई वर्षों से चल रहे प्रवचन, व्हाट्सएप्प मैसेज और दूसरों की दी हुई मिथ्या राय से हमारे विचारों की गुलामी का नतीजा है| इसके परिणाम इतने घातक हैं की हमारे पास खुद ईश्वर का दिया हुआ, मस्तिष्क होने के बाद भी हम गुलामी के चश्मे से चीजों को आँकते हैं|



Credit[/caption]

आजादी कैसे हासिल हो सकती है? 

गुलामी से कैसे बचा जाए? सवाल यह उठता है| गुलामी से बचने के लिए आपको तार्किक रूप से सोचना शुरू करना होगा| चाहे कोई भी       स्थिति हो, कैसी भी घटना हो? आपको सबसे पहले यह समझना होगा की कोई भी बात बिना दो पक्षों के नहीं हो सकती| सिक्के के हमेशा दो पहलू रहेंगे| अब यह आपको खुद निर्णय लेना होगा की कौन सा पक्ष सही है| आप अपने मस्तिष्क को थोड़ा व्यायाम का अभ्यास करायें, उसे मजबूर करें की वह भावनात्मक से ज्यादा तार्किक रूप से कार्य करना शुरू करे| अपने मस्तिष्क को यह प्रशिक्षण दें की वह किसी की भी बातों पर अन्धा विश्वास नहीं करे| कोई आपका प्रिय नेता या अभिनेता है तो इसका मतलब यह नहीं उसे भगवान समझकर आप उसके हर बात को सच मान लें या उसी के अनुसार कार्य करना शुरू कर दें| 

               निष्कर्ष:मानसिक आजादी से जुडी कुछ तार्किक बातें-

भगवान् ने सबको सोचने समझने के लिए अलग अलग दिमाग दिया है तो आप एक जैसे कैसे बन सकते हैं|आपकी परवरिश और किसी दूसरे व्यक्ति की परवरिश में जमीन में अंतर है| उनके अनुभव कुछ और हैं और आपके कुछ और! फिर कैसे आप दोनों एक जैसे निर्णय ले सकते हो| यह सब बातें जब आप मस्तिष्क के गलियारों से घुमाना शुरू करेंगे तो आपके मस्तिष्क के कुछ नए नए द्वार खुलने शुरू होंगे| जिनके अंदर से होकर आप एक अलग दिशा में चले जायेंगे| यह दिशा आपको ऐसा बना देगी की आप अपने मस्तिष्क के स्वयं शासक रहोगे| अगर आप गलत भी करोगे तो आपको खुद पता होगा की आपने गलती की है| फिर आपके दिमाग में गलती को छुपाने के बहाने नहीं आयेंगे| आप एक दिशा में सिमट कर नहीं सोचोगे फिर आपके पास खुद के इतने विचार होंगे की आपको किसी की बात पर अन्धा विश्वास होना अपने आप बंद हो जायेगा|









यह कुछ विचार मेरे दिमाग में चल रहे थे, जिन्हें मैंने आप सभी के समक्ष रखा है| आशा है की आप सभी कुशल मंगल होंगे|


जय हिन्द जय भारत||

#ShubhankarThinks

#HappyIndependenceDay

2 comments:

  1. Happy independence day
    Bhut hi gahraai se apne apni uttam soch rakhi hai 👌👋👋
    Bilkul sahi kaha apne hm manshik roop se gulam hai or hme ye gulami se ajaadi chahiye or ye ajaadi swayam vichar karke karya krne par hi milegi dhong ya andh viswaas karne se nagi 👍
    Likhte rahiye👍

    ReplyDelete

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