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Showing posts from August, 2018

आँखों से जब पर्दा हटाया ! जीवन ! कविता

बंद आँखों से "मैं" का जब पर्दा हटाया, कहने और करने में बड़ा फ़र्क पाया। सब समझने के वहम में जीता रहा "मैं", सच में समझ तो कुछ भी नहीं आया। रहा व्यस्त इतना सच्चाई की लाश ढोने में, कि जिंदा झूठ अपना समझ नहीं आया। कारण ढूँढता रहा हर सुख दुख में, अकारण मुझे कुछ नज़र नहीं आया। ढूँढता रहा सब जगह कुछ पाने की ललक से, जो मिला ही हुआ है वो ध्यान में ना आया। फँसता गया सब झंझटों में आसानी से, सरलता को कभी अपनाना नहीं चाहा। झूठ ही झूठ में उलझा हुआ पाया, आंखों से जब जब पर्दा हटाया। ~ #ShubhankarThinks

Independence Day Special: मानसिक गुलामी से आजादी कैसे पायें?

नमस्कार दोस्तों आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें| आजादी के पर्व के इस पावन मौके पर मानसिक गुलामी से आजादी के विषय में कुछ विचार आप सभी के समक्ष रखने जा रहा हूँ| आशा है आप समय देकर पढ़ेंगे| प्रस्तावना -                           15 अगस्त 1947 यह तिथि सभी को अच्छे से याद है क्योंकि इस दिन लगभग 800 वर्षों की गुलामी झेल रहे भारत को पूर्ण रूप से आजादी मिली थी| उस दिन से आज तक हम प्रतिवर्ष यह उत्सव के रूप में मनाते हैं और वीर अमर शहीदों को नमन करते हैं| इन सबके बीच भारत ने एक लम्बा सफर तय किया, जिसमें हमने बहुत सारे क्षेत्रों में तरक्की हांसिल की मगर कुछ बातों में हम पहले से भी ज्यादा पिछड़ गए| वह हैं भाईचारा, रिश्ते नाते निभाना या फिर इंसानियत के मायने हों, इन सब में हम कहीं पीछे खड़े हैं| खैर आज इस विषय पर चर्चा नहीं होगी| आज हम चर्चा करेंगे वर्तमान समय में आजादी के मायनों की और किस तरह की आजादी से हम दूर हो चुके हैं| Pic Credit मेरे अनुसार आजादी की परिभाषा- वर्तमान समय की दृष्टि से आजादी का तात्पर्य हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाना नहीं है| भारतीय