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Showing posts from May, 2018

कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं ! 10 May 2022

 कभी कभी घिर जाते हैं हम गहरे किसी दलदल में, फँस जाते हैं जिंदगी के चक्के किसी कीचड़ में, तब जिंदगी चलती भी है तो रेंगकर, लगता है सब रुका हुआ सा। बेहोशी में लगता है सब सही है, पता नहीं रहता अपने होने का भी, तब बेहोशी हमें पता नहीं लगने देती कि होश पूरा जा चुका है। ठीक भी है बेहोशी ना हो तो पता कैसे लगाइएगा की होश में रहना क्या होता है, विपरीत से ही दूसरे विपरीत को प्रकाश मिलता है अन्यथा महत्व क्या रह जायेगा किसी भी बात का फिर तो सही भी ना रहेगा गलत भी ना रहेगा सब शून्य रहेगा। बेहोशी भी रूकती नहीं हमेशा के लिए कभी आते हैं ऐसे क्षण भी जब एक दम से यूटूर्न मार जाती है आपकी नियति, आपको लगता है जैसे आँधी आयी कोई और उसने सब साफ कर दिया, बेहोशी गिर गयी धड़ाम से जमीन पर, आपसे अलग होकर। अभी आप देख पा रहे हो बाहर की चीजें साफ साफ, आपको दिख रहा है कि बेहोशी में जो कुछ चल रहा था वो मेरे भीतर कभी नही चला। जो भी था सब बाहर की बात थी, मैं तो बस भूल गया था खुद को बेहोशी में, ध्यान ना रहा था कि सब जो चल रहा था कोई स्वप्न था। खैर जो भी था सही था, जैसी प्रभु की इच्छा, जब मन किया ध्यान में डुबो दिया जब मन कि

गरीबी vs सर्वशिक्षा अभियान

दरअसल मेरे भी मन में कई बार आता है की ये छोटे बच्चे काम क्यों करते हैं!आखिर सरकार इन्हें पढाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत क्या कुछ नहीं करती है। ज्यादा इमोशनल मोड़ देना मुझे नहीं आता है मगर मैंने भुट्टे वाले 10 साल के लड़के से हँसते हुए ही पूछा "तू पढ़ने नहीं जाता क्या?" वो चहककर बोला गर्मी की छुट्टी चल रही हैं। मैंने पूछा अगर स्कूल खुल गए तब क्या करेगा? उसने बड़े कॉन्फिडेंस के साथ बोला कि ये सब बन्द कर दूँगा। अब मैं खुश नहीं हुआ यह सुनकर क्योंकि एक मात्र शिक्षा सब चीजों का समाधान नहीं हो सकती, हो सकता है उसके घर की परिस्थिति इतनी खराब हो कि वो ठेला 10 साल के बच्चे से लगवा रहे हैं। ऐसे में वो कुछ कमा कर दे रहा है तो मुझे इसमें कोई बुराई नहीं लगती अगर कोई बच्चा ,बड़ा या बूढ़ा काम करके कुछ भी कमा रहा है। जाते जाते मुझे सलाह तो नहीं देनी थी मगर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उससे कहा कि तेरी छुट्टी कितने बजे होती है तो वो बोला "एक बजे " मैंने कहा तब तो तू 4,5 बजे से लेकर रात तक यहाँ ठेला लगा लेना। उसके चेहरे पर हँसी आ गयी बोला "हां ये सही रहेगा"|

जिस्मानी मोहब्बत !Erotica

Declaimer- Strictly 18+ content, read at your own risk. रूह की मौजूदगी क्या कर पायेगी, जिस्मों की सनसनी जब महफ़िल जमायेगी। हैं तैयार दो बदन रुख़सत की शिरकत में, हवस तौर से उतरेगी मोहब्बत की कसरत में। गुनाह माफ़ कर देना अब इनसे तौबा ना होगी, जिस्मानी हसरतें अब हौव्वा ना होगी। लगाकर जाम होठों पर, शौक से मयकशी होगी, फ़ेंक कर लिबास कोने में खूब बेकदरी होगी। जिस्म ऐसे चिपक जाए, जैसे गोंद से जोड़ दिए हों, बदन ऐसे झुके होंगे, जैसे कमर से मोड़ दिए हों। रात खौफ़ में होगी कहीं वजूद ना हिल जाए, आवाज़ों के डर से कहीं दिन ना निकल जाए। पलँग चरचराहट में आज टूट ना जाये, दोनों जी भर के खेलेंगे, कुछ भी छूट ना जाये। #ShubhankarThinks Image Credit - Pixabay Note- यह मेरी अब तक कि कविताओं से बिल्कुल अलग लिखा है, लिखने के पीछे कोई खास वजह नहीं थी। आप अपनी राय कॉमेंट में बता सकते हैं। धन्यवाद।

Thought of the day 8may

कई बार होता यह है कि हम क्रोध में आकर या फिर किसी बात को बिना जाने ही निर्णय लेने की कोशिश करते हैं|जो कई बार आपकी लड़ाई करा देता है अथवा लोगों को आपके खिलाफ करा देता है। क्योंकि आपके द्वारा गुस्से में लिए हुए निर्णय की चपेट में कई बार वो लोग भी आ जाते हैं , जो अपनी जगह ठीक होते हैं। इसलिए कोई भी बात बोलने से पहले या फिर निर्णय लेने से पहले खुद की मानसिक स्थिति को जाँच लें कहीं आप गुस्से में तो नहीं हैं।