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Showing posts from February, 2018

बेमेल प्रेम

जंगल जंगल भटका करूँ ,
मेरा कोई भव्य निवास नहीं!
भूत प्रेत के बीच रहा करूँ,
यहाँ इंसानों का वास नहीं|

तू महलों की राजकुमारी,
तुझे कठिनाई का आभास नहीं|
तूने शाही महल में आराम किया है,
तुझे पहाड़ों के संकट ज्ञात नहीं|

तू मखमल बिस्तर पर सोने वाली,
तुझे जमीन पर सोने का अभ्यास नहीं|
देख पार्वती तू बात माना कर,
मेरे साथ विवाह की हठ ना कर|

तू सुख सुविधा की है अधिकारी,
मेरी हालत देख सब बोलें भिखारी!

तेरी जग में हँसाई हो जाएगी,
मेरे साथ में क्या सुख पायेगी|

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मरघट में रहना खेल नहीं,

दौलत में हमारा मेल नहीं|

तुम्हारे घर माया की कमी नहीं,

एक कौड़ी नहीं मेरे खजाने में|



बात मेरी तो गौर से सुन ले,

दृश्य भविष्य का एक बार तो बुन ले|

तेरी सखी सहेली महलों में रहेंगी,

तेरी दशा देख सब ताने देंगी|



उस दिन तब तू पछताएगी,

भूतों के बीच तू ना रह पायेगी|

प्रेम तेरा फिर क्या कर पायेगा,

मेरा हाल देख वो …

समाज का लेखकीकरण

वो कहते हैं ना, खुद को कितना भी रंगों में रंग लो,
मगर एक दिन पानी पड़ते ही असली रंग दिख ही जाता है|
कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी थी देश में शायर लेखकों की ,
फिर एक दिन आँधी आयी और सबके पत्ते खुल गये|

कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी है, कविता ,कहानी लिखने और सुनाने की!
इन सबके बीच बढ़ा है, लेखकों का धंधा!
कोई नेम के चक्कर में फेमिनिज्म को बाहों में भर लिया,
किसी ने नेम के चक्कर अपनी लेखनी को सेक्सिसम में कैद किया!
धीरे धीरे गिरगिट को देखकर गिरगिट ने रंग बदला,
लेखनी भले ही सामाजिक मुद्दे उठा रही थी, मगर खुद की असलियत को किसी ने ना बदला|
तब लग रहा था जैसे अब हर कोने से निकलेगी आवाज,
अब होगा किसी बदलाव का आगाज़|
सबने अपने सुर को जोरों से उठाया,
जिसको मौका मिला सभी ने भुनाया!
फिर निकले वही ढाक के तीन पात,
जिनकी लेखनी कर रही थी,
महिला सुरक्षा, बाल विकास की बात,
वो खुद कर रहे थे इसके विपरीत सभी काज|
फिर चली आँधी और उड़ गए सबके चेहरों से नकाब,
असली चेहरे में खुद अपराधी निकले लेखक जनाब|
अब मचा है उपद्रव और उठी हैं कुछ आवाज,
शायद एक बदलाव का युग तो हो गया समाप्त आज,
अब फिर से लगी हैं सबको किसी और बदलाव की आस|

#ShubhankarThink…

अन्तिम दृश्य – भाग -४

इस बार चित्रण थोड़ा आगे निकल चुका था। मानो जितने समय सुधीर व्यस्त हुआ उस वक्त का सारा अध्याय निकलकर आगे पहुंच गया हो…

“भैया वो बात ये है कि मैं इस लडकी से शादी नहीं कर सकता!” – विनोद ने संकोचवश बड़ी धीमी आवाज में  बड़े भाई से  फुसफुसाते हुए कहा।

इतना सुनते ही सुधीर के पैरों तले जमीन खिसक गयी आखिर बात ही ऐसी बोली थी।

हुआ ये था कि सुधीर अब २३ वर्ष का हो गया था और अच्छी खासी नौकरी भी लग गयी थी तो शक्तिप्रसाद को लगा कोई अच्छी लड़की देखकर इसकी भी शादी कर देता हूं। फिर सारे कर्मों से तृप्त होकर पत्नी के साथ तीर्थ दर्शन को निकल जाऊंगा।

सोचने की देरी थी, बिना किसी की मर्जी पूछे बोल दिया पंड़ित जी से “अगर कोई अच्छा रिश्ता आये तो बता देना।”

पहले दोनों बेटों की शादी ऐसे ही तय हुईं थीं। अब भला शक्तिप्रसाद का निर्णय कौन  टाल सकता था। भाग्यवश पंड़ित जी की नजर में एक अध्यापक की लड़की सुनिधि थी, जो पढ़ाई में विलक्षण और गृहकार्य में दक्ष थी और रूप ऐसा कि मानो कामदेव अगर देख ले तो सहर्ष सेवक बनने को तैयार हो जाये।

सारे गुणों का अवलोकन करने बाद अगर उसे कोई देख ले, तो किसी देवी से कम नहीं लगेगी। क्योंकि लज्जा,…

Thought of the Day -14

जब आप जिंदगी के किसी मोड़ पर लगातार असफल हो रहे हो तो आपके पास दो रास्ते हैं-
पहला रास्ता यह है, कि आप यहीं रुक जाओ और आने वाली पीढ़ी को यहाँ रुकने के बहाने गिनाओ !
दूसरा यह है, कि आप लगातार प्रयास करते रहो और इतने आगे बढ़ जाओ और खुद किसी का प्रेरणास्रोत बन जाओ|







#ShubhankarThinks

#GoldenThoughts

Motivational Quote

छोटी छोटी कोशिशें रोज करो,
हर एक छोटी कोशिश अंत में बड़ी सफलता दिलाएगी!
हवा में तिनका तिनका रोज उड़ाकर देखो,
किसी ना किसी दिन वो आँधी जरूर बन जाएगी|

Morning Motivation

तबियत से कोशिश की जाये तो आसमान में भी छेद हो सकता है,
हाथ की लकीरें तो फिर भी मुलायम होती हैं,
जरा सी खरोंच से बदल जायेंगी|