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Showing posts from January, 2018

हालात एक जैसे कभी ना रहे

 ख़्वाब हो सकते हैं कितने भी हसीन, ऐसा कभी होता नहीं है कि सब सही रहे।  दो चीजें अलग हैं तो वो अलग ही रहेंगी, हो भी कैसे सकता है कि तनातनी ना रहे। सब जद्दोजहद में कि खुशियां हो मेरे हिस्से, ग़म का साया मेरे इर्दगिर्द कहीं ना रहे। कभी रौनक हुई तो कभी लंबे सन्नाटे मगर हालात एक जैसे तो कभी ना रहे। सांस छोड़ने से मौत और सांस आए तो जिंदगी, ध्यान से देख लें अगर तो ये डर कभी ना रहे। कुदरत ने बनाए हैं दुनिया में अंधेरे उजाले, ताकि मनोरंजन में कभी कोई कमी ना रहे। ~ #ShubhankarThinks

भारत का दंगानामा

नमस्कार दोस्तों कैसे हो आप सभी लोग, आशा है सभी अच्छे से अपने कार्य में व्यस्त हैं और अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं| काफी कुछ बातें मेरे दिमाग में चल रही हैं, इस पोस्ट में वो सभी बातें बताने की कोशिश करूंगा| अगर आपके पास थोड़ा समय खाली है तो ही पढ़ने की शुरुआत करें क्योंकि मुझे नहीं पता आज कितनी लम्बी बातें होंगी| अपनी स्वाभाविक भाषा के माध्यम से में शुरुआत करूंगा तो जरूरी नहीं यह कोई कविता होगी या फिर एक लेख अथवा कोई पत्र| Life Style Blog मेरे द्वारा कलम को सभी दिशाओं में मोड़ा जायेगा, पाठकों से निवेदन है की इसे किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा जायेगा |   भावनायें मैं प्रखर और स्पष्ट लिखूंगा, इसलिए यह सभी मेरे निजी विचार रहेंगे! मैंने पक्षपात किया तो यह आपकी नैतिक जिम्मेदारी रहेगी की आप पढ़ने के बाद बेधड़क सवाल करेंगे| जैसा की हम सभी जानते ही हैं की भारत पिछले 100-200 वर्षों से सभी धर्मों के मेलजोल और मिलती जुलती सभ्यता का केंद्र रहा है| आजादी के बाद का माहौल कुछ अलग ही तरह से बदला है, देश के हिस्से तो कटे ही साथ ही साथ नफरत की एक नई फसल बढ़ी थी| मगर वक़्त की गाड़ी में सब कुछ बदला तब से लेकर आज तक अनेकों

फ़िज़ा बिगड़ गयी है

दंगे फसादों का दामन नहीं छूट रहा, फ़िज़ाएँ बिगड़ गयी हैं मेरे देश में! तिरंगा फहराने पर भी मार काट होती है, शायद बहरूपिये रहने लगे हैं अब इंसानों के भेष में|

मैंने हकीकत देखी है

आज मैंने एक हक़ीक़त देखी, इंसान की गंदी सोच की हिमाकत देखी! कितने लोगों की नसीहत देखीं, नसीहत के पीछे सियासत देखी| ख़ुद चाहे दुनिया घूम आयें, बहन को घर में जकड़ने की हिमाकत देखी| मैंने झूठे लोगों को रोना रोते हुए, कुछ सच्चे लोगों की झूठी मुस्कुराहट देखी| कोई ख्वाब नहीं था वो, हक़ीक़त ही थी| हाँ मैंने कुछ कड़वी हक़ीक़त देखी|

उत्सव का आयोजन

​प्रभात में उमंग है, वायु भी स्वतंत्र है, आज उत्सव के आयोजन में वातावरण स्वच्छंद है। चारों दिशाएं गुंजाल हैं, प्रकृति का भी संग है। सागर की प्रसन्नता तो देखो, कितनी विशाल तरंग है! गगन भी है झूमता आज श्वेत स्वच्छ रंग है। केसरी - से रंग में प्रकाश की किरण लिये सूर्यदेव उदय हुए  अंधकार का हरण किये। वो देखो वन्य जीव को उत्सव के आयोजन में रत हर एक सजीव को मधुर - मधुर ध्वनि से पूर्ण आयोजकों के गीत को। सोलह श्रृंगार धरे धरा आज चमक उठी देशभक्ति स्वरों की ध्वनि कलरव - सी चहक उठी। आकर्षण का केन्द्र तो वो हरित उद्यान है। पुष्प जहां पर खिल रहें और भंवरे चलायमान हैं। मां भारती की देन है सब मां भारती महान है। मां भारती की ममता से समस्त भारत में धन - धान्य है। IMG यह कविता मैंने सही एक साल पहले 25 जनवरी को लिखी थी और किसी कारणवश इसे 26 जनवरी के पवन अवसर पर पब्लिश नहीं कर पाया था ,मगर आज वह मौका फिर से मिला है| अपनी प्रतिक्रियायें देना नहीं भूलें, आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनायें|

अभिव्यक्ति की सीमा

हाँ अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान तुम्हें दिलाता है, किसी आवाज़ तुम्हारी अभिव्यक्ति में कुचल कर ना रह जाये, यह आपके विवेक को दर्शाता है|

Thought of the Day

इत्तेफ़ाक से मेरी क़िस्मत की मुलाक़ात एक मोड़ पर नाकामयाबी से हो गयी, फिर क्या दोनों में यही बहस चल रही है! आखिर मेहनत का साथ कौन देगा?

अकेले बढ़ोगे तो क्या बात होगी

राह में पैर फिसल गया तो क्या हुआ? अगर एक बार बिना सहारे के उठा तो क्या बात होगी| राह-ए- मंज़िल नहीं है आसान तो क्या हुआ? अगर एक बार आगे निकल गया तो फिर क्या बात होगी| रोड़े पड़े हैं राहों में तेरे तो क्या हुआ? गिर गिर के हर बार उठा तो फिर क्या बात होगी| हौसले टूटते हैं कठिनाइयों में तो क्या हुआ? अगर एक बार फिर से तूने हिम्मत जुटा ली तो क्या बात होगी| नाकाम हुआ हर बार की तू राहों में तो क्या हुआ? तू ध्यान कोशिश में लगा फिर देख क्या बात होगी| अकेले पार नहीं कर पाते सब मुश्किलों की डगर को! तो क्या हुआ? अगर तूने एक बार पार किया तो फिर देख क्या बात होगी|

Morning motivation

  राह में पैर फिसल गया तो क्या हुआ? अगर एक बार  बिना सहा रे के उठा तो क्या बात होगी|

Thought of the day 15jan

 रिश्ते भी शतरंज खेल की तरह हैं, जब तक खेल दो खिलाड़ियों के  बीच चल रहा है तो ठीक है! जहाँ किसी तीसरे ने दखलंदाज़ी की, वहीं सारा खेल बिगड़ जाता है|

Thought of the day 13jan

  नयी बुनियाद में जरूरत थी थोड़ी  पानी की तराई की, साजिशन यह काम एक फ़रेबी कारीगर ने लिया! फिर रोज़ पानी की अतिशयोक्ति की गयी, और ढहा दी गयी वो कच्ची नींव  पर टिकी बुलंद दीवार|

Thought of the day 12Jan

  निकले थे हम भी अकेले ही राहों में, जुनून जोश लिए मन में| फिर कभी उसूलों की रुकावट हुई तो  कहीं तज़ुर्बे ने कुछ राहों पर आगे बढ़ने से रोका| अब देख लो खुद को जमाने की रफ्तार में  खुद को थोड़ा पीछे पाता हूँ|