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जब आप जिंदगी के किसी मोड़ पर लगातार असफल हो रहे हो तो आपके पास दो रास्ते हैं-
पहला रास्ता यह है, कि आप यहीं रुक जाओ और आने वाली पीढ़ी को यहाँ रुकने के बहाने गिनाओ !
दूसरा यह है, कि आप लगातार प्रयास करते रहो और इतने आगे बढ़ जाओ और खुद किसी का प्रेरणास्रोत बन जाओ|

Saturday, November 4, 2017

राजनीतिक इश्क़

मैं लाचार सा एक आशिक़ हूँ,
हालत मेरी सरकार के भक्तों जैसी है !
अगर याद करूँ वो शुरुआती दिन ,
जैसे किसी चुनावी तैयारी में गुजर रहे थे, रात और दिन |

तब तू रोज मुझसे मिलने आती थी ,
कसमें वादे रोज़ नए तू खाती थी !
अभी भी रखे हुए हैं ,
तेरे भेजे हुए सब प्रेमपत्र !
जैसे किसी राजनीतिक पार्टी का हो लुभावना घोषणापत्र|

मैं भी भविष्य के सपने बुनता था रात-दिन ,
मानो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले हों अच्छे दिन!

तूने बोला था,
हो जाओ तैयार अब दिन-रात सब अच्छे हो जायेंगे!
चिंता की कोई बात नहीं प्रेम-रुपी मन्दिर हम यहीं बनाएँगे|

तू पहले ख़ूब बतलाती थी,
मेरी बातों पर खिलखिलाती थी!
फिर लगने लगीं मेरी सब बातें गंदी,
तू फिर ऐसे चुप हो गयी,
जैसे १०००-५०० के नोटों पर लगी हो नोटबंदी|

हिम्मत तब भी ना मैंने तोड़ी थी,
इस रिश्ते को मैं जोड़ने में लगा था!
ठीक वैसे जैसे एक आम आदमी काम धन्धा सब छोड़कर,
बैंक की लाइन में खड़ा था |

तुमने मुझसे बात करना तक कम कर दिया था,
तुम्हें शायद दिख रहा था ,मुझमें कोई ५०० का नोट!
तिरस्कार किया मेरा ऐसा जैसे मेरे अन्दर आ गयी कुछ खोट|

तुम्हारे भाव क्या पहले से कम बढ़ रहे थे?
नोटबंदी को देखकर ये और भी चढ़ रहे थे,
मैं अभागा ४G का डेटा निकला!
जिसके भाव इंसानियत से भी ज़्यादा घट रहे थे|

ख़ैर तुम्हारी नफ़रत की आँधी उतर चुकी थी,
बात पहले जैसी नहीं कुछ बची थी!

फिर तुमने भेजी थी वो आखिरी चिट्ठी,
जिसे पढ़ने के बाद बन गयी मेरी गम्भीर स्थिति!
वो बिल्कुल ऐसी थी,
जैसे सेलिंग पर्चेज़िंग पर लगा दी हो जीएसटी|

हमारी प्रेम कहानी कहाँ कुछ बची है,
अब तू मुझसे हो चुकी है बेख़बर!
मुलाक़ातें हमारी अब बहुत घट चुकी हैं,
जैसे घटे हैं देश में रोज़गार के अवसर|

मेरी ज़िंदगी से तेरे बनाये प्रेम -रूपी बादल एक एक करके घटे हैं,
जैसे किसानों की फसल के दाम मण्डियों में घटे हैं|

मैं अब जोह रहा हूँ चुनावी दिनों की बाट,
कम से कम इस मौसम ना सही,
अगले मौसम में फिर से आयेगी तुम्हें मेरी अहमियत की याद|

धन्यवाद!









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Shubhankar Thinks

3 comments:

  1. मधुसदन सिंहNovember 5, 2017 at 8:52 AM

    वाह वाह।जबर्दस्त कटाक्ष!!
    वह बेवफा ही क्या जो साथ निभा दे,
    वह नेता ही क्या जो वादा निभा दे,
    आईये इंतेज़ार
    और
    यादों के समन्दर में गोता लगाते हैं,
    उनके दिखाए ख्वाबों की ज्वाला में,
    खुद को जलाते हैं,

    ReplyDelete
  2. bhut shandar sir apne gazzab panktiyon k sath pratikriya di !
    bhut dhanyvaad apka sir

    ReplyDelete
  3. Nice And Very useful info,
    This article important and really good the for me is.Keep it up and thanks to the writer.Amazing write-up,Great article. Thanks!

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