Skip to main content

State of joyfulness

You become happy when outside circumstances come in your favor,You become joyful when none of the outside circumstances affect you anymore.~ #ShubhankarThinks#joyfull #happy #quote

राजनीतिक इश्क़

मैं लाचार सा एक आशिक़ हूँ,
हालत मेरी सरकार के भक्तों जैसी है !
अगर याद करूँ वो शुरुआती दिन ,
जैसे किसी चुनावी तैयारी में गुजर रहे थे, रात और दिन |

तब तू रोज मुझसे मिलने आती थी ,
कसमें वादे रोज़ नए तू खाती थी !
अभी भी रखे हुए हैं ,
तेरे भेजे हुए सब प्रेमपत्र !
जैसे किसी राजनीतिक पार्टी का हो लुभावना घोषणापत्र|

मैं भी भविष्य के सपने बुनता था रात-दिन ,
मानो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले हों अच्छे दिन!

तूने बोला था,
हो जाओ तैयार अब दिन-रात सब अच्छे हो जायेंगे!
चिंता की कोई बात नहीं प्रेम-रुपी मन्दिर हम यहीं बनाएँगे|

तू पहले ख़ूब बतलाती थी,
मेरी बातों पर खिलखिलाती थी!
फिर लगने लगीं मेरी सब बातें गंदी,
तू फिर ऐसे चुप हो गयी,
जैसे १०००-५०० के नोटों पर लगी हो नोटबंदी|

हिम्मत तब भी ना मैंने तोड़ी थी,
इस रिश्ते को मैं जोड़ने में लगा था!
ठीक वैसे जैसे एक आम आदमी काम धन्धा सब छोड़कर,
बैंक की लाइन में खड़ा था |

तुमने मुझसे बात करना तक कम कर दिया था,
तुम्हें शायद दिख रहा था ,मुझमें कोई ५०० का नोट!
तिरस्कार किया मेरा ऐसा जैसे मेरे अन्दर आ गयी कुछ खोट|

तुम्हारे भाव क्या पहले से कम बढ़ रहे थे?
नोटबंदी को देखकर ये और भी चढ़ रहे थे,
मैं अभागा ४G का डेटा निकला!
जिसके भाव इंसानियत से भी ज़्यादा घट रहे थे|

ख़ैर तुम्हारी नफ़रत की आँधी उतर चुकी थी,
बात पहले जैसी नहीं कुछ बची थी!

फिर तुमने भेजी थी वो आखिरी चिट्ठी,
जिसे पढ़ने के बाद बन गयी मेरी गम्भीर स्थिति!
वो बिल्कुल ऐसी थी,
जैसे सेलिंग पर्चेज़िंग पर लगा दी हो जीएसटी|

हमारी प्रेम कहानी कहाँ कुछ बची है,
अब तू मुझसे हो चुकी है बेख़बर!
मुलाक़ातें हमारी अब बहुत घट चुकी हैं,
जैसे घटे हैं देश में रोज़गार के अवसर|

मेरी ज़िंदगी से तेरे बनाये प्रेम -रूपी बादल एक एक करके घटे हैं,
जैसे किसानों की फसल के दाम मण्डियों में घटे हैं|

मैं अब जोह रहा हूँ चुनावी दिनों की बाट,
कम से कम इस मौसम ना सही,
अगले मौसम में फिर से आयेगी तुम्हें मेरी अहमियत की याद|

धन्यवाद!









style="display:block; text-align:center;"
data-ad-layout="in-article"
data-ad-format="fluid"
data-ad-client="ca-pub-5231674881305671"
data-ad-slot="8314948495">






आप सभी वर्डप्रेस मोबाइल यूज़र्स यहाँ जाकर कमेंट कर सकते हैं!

यह कविता ऑडियो में सुनने के लिए दिए हुए लिंक पर जाएँ और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें!

https://www.youtube.com/watch?v=XaedoiTohjs

All rights reserved.

Shubhankar Thinks

Comments

  1. मधुसदन सिंहNovember 5, 2017 at 10:22 PM

    वाह वाह।जबर्दस्त कटाक्ष!!
    वह बेवफा ही क्या जो साथ निभा दे,
    वह नेता ही क्या जो वादा निभा दे,
    आईये इंतेज़ार
    और
    यादों के समन्दर में गोता लगाते हैं,
    उनके दिखाए ख्वाबों की ज्वाला में,
    खुद को जलाते हैं,

    ReplyDelete
  2. bhut shandar sir apne gazzab panktiyon k sath pratikriya di !
    bhut dhanyvaad apka sir

    ReplyDelete
  3. Nice And Very useful info,
    This article important and really good the for me is.Keep it up and thanks to the writer.Amazing write-up,Great article. Thanks!

    ReplyDelete

Post a Comment

Please express your views Here!

Popular posts from this blog

Scientific reasons behind Hindu Rituals

Hinduism is the world’s oldest living religion and there are thousands of customs & traditions. Most of us really don’t know what is the scientific reason behind them even we have no idea about it.

1- Blowing Shankha(Conch shell) - In Hinduism, According to our ancient scriptures that Puranas, the shank originated during the Churning of the ocean (Samudra Manthan) by the Deities and Shri Vishnu held it in the form of weapon. As per a holy verse which is regularly chanted during the puja ritual it is mentioned that by the command of Shri Vishnu the deities Moon, Sun and Varun are stationed at the base of the shank, the deity Prajapati on its surface and all the places of pilgrimage like Ganga and Saraswati in its front part.

We blownShankha before starting any religious event even some of the people blown it every day during their regular prayer.

According to science, the blowing of a conch shell enhances the positive psychological vibrations such as courage, determination hope, op…

प्रेम पत्र २(पत्र का जवाब)

जैसा आपने पिछले पत्र में पढा था कि प्रेमिका रूठकर व्यंगपूर्ण पत्र लिखती है और जब यह पत्र उसके प्रेमी को मिलता है तो वो अपनी प्रेमिका को मनाने और भरोसा दिलाने के मकसद से पत्र का प्रेमपूर्ण जवाब लिखता है मगर मस्तिष्क में चलते गणित के कारण कैसे उसके विचार पत्र के माध्यम से निकलते हैं पढ़िए -



IMG source - http://i.huffpost.com/gen/1178281/images/o-LETTER-TO-EX-facebook.jpg








प्रेमी  अपनी प्रेमिका से -

प्रेमिका मेरी ओ प्राण प्यारी!

तुम्हे एक पल हृदय से ना दूर किया है ,

तुम्हारा और मेरा संग तो रसायन विज्ञान में जल बनाने की प्रक्रिया है !

जैसे हाइड्रोजन नहीं छोड़ सकती ऑक्सीजन का संग,

भगवान ने ऐसा रचा है ,हमारा प्रेम प्रसंग|





दुविधा सुनो मेरा क्या हाल हुआ है,

पूरा समय गति के समीकरणों में उलझ गया है !

कभी बल लगाकर पढ़ाई की दिशा में बढ़ता हूँ,

कभी तुम्हारे प्रेम की क्रिया प्रतिक्रिया से पीछे तुम्हारी दिशा में खींचता हूँ|



मेरे विचारों का पाई ग्राफ उलझ जाता है ,

ये Tan@  के मान की तरह कभी ऋणात्मक अनंत तो कभी धनात्मक अनंत तक जाता है !

मेरे ग्राफ रूपी जीवन में सारे मान अस्थिर हैं ,

मगर तुम्हर स्थान मेरे हृदय में पाई(π) …

पथ भ्रष्ट हैं इसलिए कष्ट हैं

क्यों पस्त हैं, क्या कष्ट है? किस अंधेर का आसक्त है। क्यों पस्त है कुछ बोल तू, अगर कष्ट में तो बोल तू, क्यों लड़ रहा हूं खुद से ही, ज़ुबान है तेरी भी, खोल तू।
क्यों भ्रष्ट हैं, वो मस्त हैं, वो निगल रहे हैं सारा देश! हम कष्ट में, पथ भ्रष्ट हैं, नहीं बच रहा है कुछ भी शेष। वो भ्रष्ट हैं क्योंकि हम कष्ट में, वो मस्त हैं क्योंकि ख़ुद हम भ्रष्ट हैं।
जो सख़्त हैं वो लड़ रहे हैं, जो कष्ट में भी बढ़ रहे हैं! जो कष्ट में भी सख़्त हैं, जो सख़्त हैं, वो समृद्ध हैं। क्यों हतप्रभ है, किसी समृद्ध से, तेरे भी हस्त हैं, चला इन्हें शस्त्र से! तेरे पास वक़्त है, तेरे पास शस्त्र हैं, फ़िर क्यों तू स्तब्ध है, यूं कष्ट में?
क्यों निर्वस्त्र है अगर वस्त्र हैं, क्यों चल रहा ये नग्न भेष, अगर निर्वस्त्र ज्यादा सभ्य है, तो मत कहो कि मानव है विशेष। कहो जीव सारे सभ्य हैं, वो सब भी तो निर्वस्त्र हैं| सब निर्वस्त्र ही समृद्ध थे, तो कोई लाया ही क्यों ये वस्त्र है। अब ये वस्त्र हैं तो बढ़ा कष्ट है, कोई सभ्य है तो कोई निर्वस्त्र है।
कुछ कटु सत्य हैं, जो कहीं लुप्त हैं, सही वक्तव्य हैं जो अभी गुप्त हैं। ना कुछ लुप्त ह…