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जब आप जिंदगी के किसी मोड़ पर लगातार असफल हो रहे हो तो आपके पास दो रास्ते हैं-
पहला रास्ता यह है, कि आप यहीं रुक जाओ और आने वाली पीढ़ी को यहाँ रुकने के बहाने गिनाओ !
दूसरा यह है, कि आप लगातार प्रयास करते रहो और इतने आगे बढ़ जाओ और खुद किसी का प्रेरणास्रोत बन जाओ|

Monday, October 16, 2017

धनतेरस का महत्व,तिथि , पौराणिक कथाएँ

नमस्कार , कैसे हैं आप सभी लोग ?

जैसा की आप सभी उत्सव की तैयारियों में व्यस्त होंगे , आप सभी को पता होगा दीवाली  अकेला उत्सव नहीं है! इसके साथ में ३-४ उत्सव और भी मनाए जाते हैं ,उन्हीं में से एक प्रारंभिक उत्सव है धनतेरस , जिसके बारे में मैं ये ब्लॉग लिखने जा रहा हूँ आशा है ,आपको कुछ नया जानने को मिले या फिर आपकी कुछ स्मृतियां ताज़ा हो जाएं तो शुरू करते हैं -





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प्रस्तावना :- धनतेरस का पर्व कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है , जैसा कि हम सभी का मानना
है कि धनतेरस के दिन खरीददारी करने से घर में सुख समृद्धि आती है और माना जाता है कि धन की देवी लक्ष्मी इससे प्रसन्न
होती हैं !


यह था एक छोटा सा प्रारंभिक परिचय अब आते हैं , एक प्रश्न पर , आखिर धनतेरस का पर्व क्यों मनाया जाता है ? 

मुझे धनतेरस से जुड़ी सारी पौराणिक कथाएं ज्ञात नहीं हैं फिर भी कुछ कथाओं का आपके समक्ष वर्णन करने जा रहा हूँ!




धनतेरस का महत्व - जैसा कि हम सभी को ज्ञात होगा कि धनतेरस के दिन यमराज और वैध-ऋषि भगवान धन्वंतरि की पूजा भी की जाती है ! आपको मैं बताना चाहूंगा धन्वंतरि ऋषि को हिन्दू धर्म में चिकित्सा का जनक माना जाता है , जो अपनी औषधि और उपचार से जटिलतम रोग का भी निवारण करने में सक्षम थे , तो आप अनुमान लगा सकते हैं उनकी पूजा का महत्व आखिर क्यों है ?

स्वास्थ्य से ही मनुष्य सुखी और समृद्ध रह सकता है क्योंकि जब शरीर ही साथ नहीं देगा तो आप कोई भी कर्म पूरी लगन और निष्ठा से नहीं कर पायेंगे!

धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथाएँ:-


  • आपको जैसा पता होगा कि देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था जिसमें से विष, अमृत, ऐरावत हाथी, कामधेनु आदि बहुमूल्य तत्व निकले थे , उन्हीं मैं से एक थे भगवान धनवंतरि जो कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को अपने हाथों में अमृत का कलश लेकर सबके समक्ष प्रकट हुए थे |



इसे भी एक कारण माना जाता है कि आखिर धनतेरस को सुख समृद्धि का प्रतीक क्यों है?

 

अब बात करते हैं दूसरे पौराणिक कथा की :-

जैसा की शास्त्रों में सुर और असुरों के आपसी तनाव की अनेकों कथाएं वर्णित है, वहां से ज्ञात होता है कि देवतओं के गुरु थे गुरु वृहस्पताचार्य और असुरों के गुरु शुक्राचार्य , दोनों अपने अपने दल के प्रमुखों का मार्गदर्शन करते थे!

एक समय की बात है ,

सभी देवता राजा बलि के भय से ग्रस्त थे तो उन्होंने विष्णु भगवान से प्रार्थना की "आप कैसे भी हमें महाराजा बलि के बढ़ते प्रभुत्व से मुक्ति दिलाएं"

भगवान विष्णु ने वामन ब्राह्मण का रूप लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुँचे , वहाँ शुक्राचार्य पहले से पहुँच गए और राजा बलि को सारा वृतांत बता दिया कि विष्णु भगवान वामन के रूप में आएंगे और तुमसे भिक्षा में तुमसे तुम्हारा साम्राज्य मांग लेंगे इसलिए तुम्हें पहले ही सचेत किये देता हूँ , साफ इंकार कर देना !

अब जैसे ही भगवान वहां पहुचे शुक्राचार्य ने फिर से कुछ हरकत की तो उसके परिणाम स्वरूप भगवान ने  शुक्राचार्य की एक आँख में अपनी छोटी घुमा कर मार दी जिससे उसकी एक आँख बुरी तरह जख्मी हो गयी वो दिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की तिथि त्रयोदशी थी तभी से मान्यता है की धनतेरस मनाया जाता है |

क्योंकि शुक्राचार्य की आंख फोड़ने के बाद भगवान ने बलि से सब कुछ दान में मांगकर देवताओं को भयमुक्त किया था !





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मेरी पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं!

आशा करता हूँ आप सभी कुशल मंगल उत्सव को हर्सोल्लास के साथ मनाएंगे !

धन्यवाद!







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