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State of joyfulness

You become happy when outside circumstances come in your favor,You become joyful when none of the outside circumstances affect you anymore.~ #ShubhankarThinks#joyfull #happy #quote

चिंगारी उठी कोई ,जल उठा शहर मेरा!

​चिंगारी उठी कोई फिर ,

छिट पुट सी बातों में जलने लगा शहर मेरा !

ना होश है उन्हें अपनों का , 

ना रहा कोई तेरा मेरा |




किसी ने बीच में जाकर सभी से प्रश्न ये पूछा ?

"क्या यही सिखलाता है मजहब - धर्म तेरा ?"




मचलकर लोग गुस्से में तुनक कर गुमान से बोले 

"ये शुरुआत थी अभी तक कि , हम पूरा जहाँ जला देंगे !"

Jla do


बड़ा विचलित हुआ वो सुनकर फिर भयभीत से कठोर स्वर में बोला -







" ये लो माचिस और ये ईंधन भी ,

जला दो अब ये शहर सारा!

ये घर सारे जला देना,

जला देना वो चौराहा !




वाहन भी जला दो तुम,

दुकानें भी जला देना !

किसी के आशियाने उजाड़ दो तुम,

किसी की रोजगारी जला देना |







जला दो वो शिला लेख सारे,

जिसमें इंसानियत का सबब हो!

जला दो वो तहज़ीब विरासत भी,

जिसमें आदाब-ओ - अदब हो |







वतन परस्ती की इबादतें भी ,

कानूनी हिसाब तुम जला देना !

मानवता सिखाने वाली,

किताबें तुम जला देना|




जलाकर राख कर दो तुम ,

मेरे देशी अरमानों को !

रहे बाकी कुछ जलाने को,

तुम मुझको भी जला देना |







बनेगी राख जब इन सबकी ,

हवा में मिलावटें होंगी!

तुम्हारे इन साफ चेहरों पर ,

कल जब कलिखें होंगी !




भले ही दर्ज ना हो तुमपर कोई आपत्ति अदालत में ,

मगर ऊपर वाले की अदालत में सुनवाईयाँ जरूर होंगी |"





वो खरा इंसान अभी इतना ही बोल पाया ,

उसकी तिरस्कारपूर्ण बातें सुनकर एक चतुर प्राणी चकराया !

पूरे माजरे को समझने में उसने एक मिनट ना लगाया!

फिर भीड़ को चीरकर वो जोरों से चिल्लाया -




"ये प्रवचन नहीं दे रहा भक्तों , कर रहा ये हमारी कठोर निन्दा है !

ये पक्का कोई कांग्रेसी है या फिर बीजेपी का कोई नया एजेंडा है|"

इतने सुनने भर की देरी थी बस,

उठी लाठी चली कृपाण तन कर,

फिर टूट पड़े सब उस सज्जन पर!




चिंगारी उठी कोई,

फिर जल उठा शहर सारा|




© ConfusedThoughts

- Shubhankar

Do listen the audio version of this poem.

Comments

  1. Bahut sundar likha apne, sahi kaha abhi jo mahool hai pure news mai yahi khabar h.

    ReplyDelete
  2. Bhut dhanyavaad apka ki apko ye Kavita pasand ayi

    ReplyDelete
  3. बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति हुई है आज के समय पर।

    ReplyDelete
  4. कविता बहुत ही बखूबी से अभी की हो रही घटनाओं को बता रही है।बहुत खूब

    ReplyDelete
  5. शानदार लेखन---प्रत्येक लाईन अपने आप मे बहुत कुछ कहती हुई---

    जला दो वो शिला लेख सारे,

    जिसमें इंसानियत का सबब हो!

    जला दो वो तहज़ीब विरासत भी,

    जिसमें आदाब-ओ – अदब हो |

    ReplyDelete
  6. Mam apki comments hmesha motivate krne wali Hoti Hai !
    Thanks for reading !
    I am glad you like it !

    ReplyDelete
  7. Bhut dhanyavaad apka sir ki apko Kavita pasand ayi !
    Bdi Sahi panktiyan uthayi Hai apne to , yhi uddeshya Tha Mera ki ye pankti point out ho 😀😀

    ReplyDelete
  8. प्रत्येक पंक्तिया लाजवाब है ये कुछ ज्यादा अच्छा लगा।स्वागत आपका।

    ReplyDelete
  9. Bohot khub👏👏The way you expressed it was wonderful👍

    ReplyDelete
  10. Thank you so much shivee, I am glad you liked it !

    ReplyDelete
  11. Thank you so much mam!
    I am glad you liked it

    ReplyDelete
  12. Amazing, amazing thought! Reblogging it now :)

    ReplyDelete
  13. Thank you so much didi , I am glad you loved it .

    ReplyDelete
  14. Reblogged this on The Pradita Chronicles and commented:
    Good Morning and Eid Mubarak to you all.

    I hope this day brings you peace and holistic growth.

    I read this poem from Shubhankar's blog, Confused Thoughts, today, and I think he's expressed the futility of advocating peace in a warmongering, chaotic world very well. The poem is in Hindi, so for those of you who don't understand the language, I'll give you a gist of what he's trying to say.

    He portrays the scene of a riot, where the rioters have no clue what they are rioting for. They just want to burn down the whole town. A peace loving man approaches one of the rioters and tries to explain to him what all they may lose if they burn down the town - humanity, law and order, care, hearth and home to many. He makes a final attempt to dissuade the rioters by reminding them of the Almighty and Judgment Day. But the rioters instead, take him as a man from the enemy side and kill him instead.

    I thought this poem reflects not just on the Indian unrest in the name of religion, but also on global unrest, wherever there are riots and wars going on for whatever reasons. Often those who wage war, lose sight of what they're fighting for. No reason appeals to them until they have destroyed it all.

    For example the War in Afghanistan has been going on for the past 15 years, a little more in fact. In that time, the main reason for waging the war is long gone. It's now only about stamping out terrorist outfits in the area, at the much higher cost of destroying an entire nation and it's people. Who knows if it'll stop at stamping out terror or will continue in another form, so that Afghanistan finally becomes a victim of neocolonialism.

    Think, read and share if you can.

    ReplyDelete
  15. Thanks again !
    I read your comment there on pradita Di's blog too!
    🙏

    ReplyDelete
  16. Power-packed poem. Totally loved it!

    ReplyDelete
  17. Thank you so much ritzee !
    I am glad you loved it 😇

    ReplyDelete

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