Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2017

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

चिंगारी उठी कोई ,जल उठा शहर मेरा!

​चिंगारी उठी कोई फिर , छिट पुट सी बातों में जलने लगा शहर मेरा ! ना होश है उन्हें अपनों का ,  ना रहा कोई तेरा मेरा | किसी ने बीच में जाकर सभी से प्रश्न ये पूछा ? "क्या यही सिखलाता है मजहब - धर्म तेरा ?" मचलकर लोग गुस्से में तुनक कर गुमान से बोले  "ये शुरुआत थी अभी तक कि , हम पूरा जहाँ जला देंगे !" बड़ा विचलित हुआ वो सुनकर फिर भयभीत से कठोर स्वर में बोला - " ये लो माचिस और ये ईंधन भी , जला दो अब ये शहर सारा! ये घर सारे जला देना, जला देना वो चौराहा ! वाहन भी जला दो तुम, दुकानें भी जला देना ! किसी के आशियाने उजाड़ दो तुम, किसी की रोजगारी जला देना | जला दो वो शिला लेख सारे, जिसमें इंसानियत का सबब हो! जला दो वो तहज़ीब विरासत भी, जिसमें आदाब-ओ - अदब हो | वतन परस्ती की इबादतें भी , कानूनी हिसाब तुम जला देना ! मानवता सिखाने वाली, किताबें तुम जला देना| जलाकर राख कर दो तुम , मेरे देशी अरमानों को ! रहे बाकी कुछ जलाने को, तुम मुझको भी जला देना | बनेगी राख जब इन सबकी , हवा में मिलावटें होंगी! तुम्हारे इन साफ चेहरों पर , कल जब कलिखें होंगी ! भले ही दर्ज ना हो तुमपर कोई आपत्ति अद

सपने क्या होते हैं?

​सपने क्या होते हैं? अगर शाम ढले बेफ़िक्र होकर , लजीज़ खाना खाकर, पंखा कूलर या फिर ऐसी की ठंडी हवा में , मख़मली से आराम गद्दों पर, बड़े चैन की नींद सो जाते हो आप! तो क्या खाक सपने देखोगे आप? सपने वो होते हैं जो रातों की नींदें उड़ा दें, चैन सुकून को तुम्हारा दुश्मन बता दें, और इस शांत से दिमाग में कोलाहल मचा दें| सपने वो नहीं जिन्हें सुबह आंखें खुलते ही भूल जाओ, सपने वो हैं जिन्हें रात को आंखें मूँदने के बाद भी ना भूल पाओ! Pic credit - https://pixabay.com/photo-2037255/ सपने वो नहीं जिसमें ऐश- ओ -आराम हो, मस्त सी जिंदगी चले परेशानी का कोई नाम ना हो ! सपने वो हैं जिसमें आराम हराम हो, तुम इन रफ्तार रोकने वाली रातों से भी परेशान हो| वो सपने भी क्या सपने हुए? जो बड़ी आसानी से मिल जाएं, करना कुछ भी पड़े नहीं और सब कुछ बना बनाया मिल जाये ! सपने तो वो हैं जो पग पग पर तुम्हें सताएं, चुनौतियों से तुम्हें और मजबूत बनाएं| सपने देखो मगर देखभाल के देखो, कुछ अपने भीतर खंगाल के देखो! फिर मिल जायेंगे वो सपने तुम्हें भी, जो आंखों से तुम्हारी नींदें छीन लेंगे| © Confused Thoughts - Shubhankar कैसे हो आप सभी लो

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा !

​विस्फोटकों के डर से, सेना हटती नहीं हमारी! अरि दल की  साजिशों से , गति रुकती नहीं हमारी! अवशेष ,संस्कृति से , दृष्टि हटती नहीं हमारी ! अपवाद बंदिशों से , छवि डिगती नहीं हमारी ! कुछ खास है हममें , की हस्ती मिटती नहीं हमारी ! सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||     style="display:block; text-align:center;" data-ad-layout="in-article" data-ad-format="fluid" data-ad-client="ca-pub-5231674881305671" data-ad-slot="8314948495"> आदर्श देख इसके  लोग सुदूर से आते हैं , विचार देख इसके, चकित रह जाते हैं! सत्कार देख यहां का, वो यहीं  बस जाते हैं ! आलोचकों के इरादे सब , धरे के धरे रह जाते हैं ||     कोशिश हजार कर लो , बंदिश लगा के धर लो ! कसमें लगा लो जितनी , ताकत लगा लो जितनी ! मुँह एक साथ खोलेंगे , फिर एक स्वर में बोलेंगे - "आसानी से मिटा दोगे, हस्ती इतनी छोटी नहीं हमारी ! सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" ||     कितने भी जाति , धर्म  और प्रान्त बना लो , छल-प्रपंच सारे तुम लगा लो ! सब अपने अपने गुट बना

Surrender

Good morning guys how are you all ,I hope you all are doing well, I am pleased to inform you that one of my poem has been featured on hubpages so please do read and give your honest feedback - https://hubpages.com/literature/surrender1 Thanks