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Showing posts from August, 2017

मौसम बदले जीवन बदले, तुम फिर फिर अपने गीत सुनाना

जीवन है तो मौसम हैं, मरने के बाद बस एक मौसम रहेगा। फिर कभी नए नए मौसम देखने का मौका ना रहेगा। जीवन है तो आयेंगे उबासी भरे दिन, कभी बसंत महोत्सव कभी पतझड़ कभी बरसाती काली रातें। तुम चलते रहना अपनी राह, चाहे कोई भी हो। तुम बदल मत लेना चलने का ढ़ंग सिर्फ़ इसलिए  क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारे साथ गलत कर रही है। तुम रुक मत जाना देखकर कि कितना आसान है सब यहाँ, जहाँ तुम्हारे लिए सब कुछ उपलब्ध हो बिना किसी कठिनता के। तुम बहक मत जाना सुख देखकर, रखना याद की ये केवल एक मौसम है बदल जायेगा, तुम मन मत बना लेना सबसे कट जाने का इसलिए कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती हुई है, तुम ख़ुद से बचकर मत भागना इसलिए कि तुम में कमियाँ बहुत हैं। तुम कोई बोझ मत लाद लेना, अपने कंधे पर की तुम्हारे बिना ये सब काम कोई और ना करेगा। तुम होना खड़े किसी रास्ते पर, देखना ऊपर आसमान में और देखना फिर अपने शरीर को, कोई फ़र्क नहीं है तुम में और इस खुले आसमान में। तुम ऐसे चलना जैसे कोई राजा चलता है, ऐसे बोलना जैसे राजा बोलते हैं। तुम राजी मत हो जाना किसी के गुलाम बनने को, तुम देना सबको जितना दे सको, देखना मत मुड़कर पीछे की तरफ, राजा देते हैं

चिंगारी उठी कोई ,जल उठा शहर मेरा!

​चिंगारी उठी कोई फिर , छिट पुट सी बातों में जलने लगा शहर मेरा ! ना होश है उन्हें अपनों का ,  ना रहा कोई तेरा मेरा | किसी ने बीच में जाकर सभी से प्रश्न ये पूछा ? "क्या यही सिखलाता है मजहब - धर्म तेरा ?" मचलकर लोग गुस्से में तुनक कर गुमान से बोले  "ये शुरुआत थी अभी तक कि , हम पूरा जहाँ जला देंगे !" बड़ा विचलित हुआ वो सुनकर फिर भयभीत से कठोर स्वर में बोला - " ये लो माचिस और ये ईंधन भी , जला दो अब ये शहर सारा! ये घर सारे जला देना, जला देना वो चौराहा ! वाहन भी जला दो तुम, दुकानें भी जला देना ! किसी के आशियाने उजाड़ दो तुम, किसी की रोजगारी जला देना | जला दो वो शिला लेख सारे, जिसमें इंसानियत का सबब हो! जला दो वो तहज़ीब विरासत भी, जिसमें आदाब-ओ - अदब हो | वतन परस्ती की इबादतें भी , कानूनी हिसाब तुम जला देना ! मानवता सिखाने वाली, किताबें तुम जला देना| जलाकर राख कर दो तुम , मेरे देशी अरमानों को ! रहे बाकी कुछ जलाने को, तुम मुझको भी जला देना | बनेगी राख जब इन सबकी , हवा में मिलावटें होंगी! तुम्हारे इन साफ चेहरों पर , कल जब कलिखें होंगी ! भले ही दर्ज ना हो तुमपर कोई आपत्ति अद

सपने क्या होते हैं?

​सपने क्या होते हैं? अगर शाम ढले बेफ़िक्र होकर , लजीज़ खाना खाकर, पंखा कूलर या फिर ऐसी की ठंडी हवा में , मख़मली से आराम गद्दों पर, बड़े चैन की नींद सो जाते हो आप! तो क्या खाक सपने देखोगे आप? सपने वो होते हैं जो रातों की नींदें उड़ा दें, चैन सुकून को तुम्हारा दुश्मन बता दें, और इस शांत से दिमाग में कोलाहल मचा दें| सपने वो नहीं जिन्हें सुबह आंखें खुलते ही भूल जाओ, सपने वो हैं जिन्हें रात को आंखें मूँदने के बाद भी ना भूल पाओ! Pic credit - https://pixabay.com/photo-2037255/ सपने वो नहीं जिसमें ऐश- ओ -आराम हो, मस्त सी जिंदगी चले परेशानी का कोई नाम ना हो ! सपने वो हैं जिसमें आराम हराम हो, तुम इन रफ्तार रोकने वाली रातों से भी परेशान हो| वो सपने भी क्या सपने हुए? जो बड़ी आसानी से मिल जाएं, करना कुछ भी पड़े नहीं और सब कुछ बना बनाया मिल जाये ! सपने तो वो हैं जो पग पग पर तुम्हें सताएं, चुनौतियों से तुम्हें और मजबूत बनाएं| सपने देखो मगर देखभाल के देखो, कुछ अपने भीतर खंगाल के देखो! फिर मिल जायेंगे वो सपने तुम्हें भी, जो आंखों से तुम्हारी नींदें छीन लेंगे| © Confused Thoughts - Shubhankar कैसे हो आप सभी लो

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा !

​विस्फोटकों के डर से, सेना हटती नहीं हमारी! अरि दल की  साजिशों से , गति रुकती नहीं हमारी! अवशेष ,संस्कृति से , दृष्टि हटती नहीं हमारी ! अपवाद बंदिशों से , छवि डिगती नहीं हमारी ! कुछ खास है हममें , की हस्ती मिटती नहीं हमारी ! सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||     style="display:block; text-align:center;" data-ad-layout="in-article" data-ad-format="fluid" data-ad-client="ca-pub-5231674881305671" data-ad-slot="8314948495"> आदर्श देख इसके  लोग सुदूर से आते हैं , विचार देख इसके, चकित रह जाते हैं! सत्कार देख यहां का, वो यहीं  बस जाते हैं ! आलोचकों के इरादे सब , धरे के धरे रह जाते हैं ||     कोशिश हजार कर लो , बंदिश लगा के धर लो ! कसमें लगा लो जितनी , ताकत लगा लो जितनी ! मुँह एक साथ खोलेंगे , फिर एक स्वर में बोलेंगे - "आसानी से मिटा दोगे, हस्ती इतनी छोटी नहीं हमारी ! सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" ||     कितने भी जाति , धर्म  और प्रान्त बना लो , छल-प्रपंच सारे तुम लगा लो ! सब अपने अपने गुट बना

Surrender

Good morning guys how are you all ,I hope you all are doing well, I am pleased to inform you that one of my poem has been featured on hubpages so please do read and give your honest feedback - https://hubpages.com/literature/surrender1 Thanks