Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2017

हालात एक जैसे कभी ना रहे

 ख़्वाब हो सकते हैं कितने भी हसीन, ऐसा कभी होता नहीं है कि सब सही रहे।  दो चीजें अलग हैं तो वो अलग ही रहेंगी, हो भी कैसे सकता है कि तनातनी ना रहे। सब जद्दोजहद में कि खुशियां हो मेरे हिस्से, ग़म का साया मेरे इर्दगिर्द कहीं ना रहे। कभी रौनक हुई तो कभी लंबे सन्नाटे मगर हालात एक जैसे तो कभी ना रहे। सांस छोड़ने से मौत और सांस आए तो जिंदगी, ध्यान से देख लें अगर तो ये डर कभी ना रहे। कुदरत ने बनाए हैं दुनिया में अंधेरे उजाले, ताकि मनोरंजन में कभी कोई कमी ना रहे। ~ #ShubhankarThinks

शहरी गर्मी

​ये कविता उस स्थिति के बारे में लिखी गयी है| जब किसी नौकरी की तलाश में कोई बेरोजगार नौजवान युवा गांव से शहर का रुख करता है तो गर्मी में उसका हाल कुछ ऐसा हो जाता है- IMG credit- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:A_view_of_Road_Traffic_Chandagaur_to_New_Delhi_India_Highways.jpg गर्म मौसम और शहर का तापमान स्तर, यहां होता है माहौल औरों से इतर! लू के थपेड़ों से जलता बदन, काल के गाल में समा जाती है वो मदमस्त पवन ! वो सड़कों से उड़ती तेज  धूल , जैसे कोई चुभा रहा कोई गर्म शूल! आँखें पथरा गयी हैं  मंजिल की तलब में , सब जगह घूम रहा हूँ  मैं बेमतलब में! प्यास के मारे गला सूख गया है, पानी का ना कोई अता पता है! प्रदूषण की कालिख चेहरे पे लग रही है, आज आसमान से भी मानो आग बरस रही है! जहाँ नीम पीपल के वृक्ष थे, वहां अब मकान खड़े हैं ! जो 2-4 पेड़ भाग्यवश बच गए थे , आज वो भी बिल्कुल शांत खड़े हैं! कुछ कीकड के पेड़ बेज़ार खड़े हैं, लोग तो उसकी बनावटी छाँव में भी लगातार खड़े हैं! आँखें टोह रहीं हैं मंजिल की तलाश, सुबह से नहीं मिला सही दिशा में निकास! राहों की पहेली उलझती जा रही है, हर एक गली के बाद एक जैसी ग

ऑनर किलिंग!

​ऑनर किलिंग की घटनाएं हमारे देश में आये दिन होती रहती हैं, जिसके बाद के दृश्य को मैंने अपनी कविता के माध्यम से प्रदर्शित किया है| यह कविता लड़की के बाप के ऊपर आधारित है ,जिसमें लड़की का बाप अपनी बेटी सहित उस लड़के की हत्या कर देता है | आरोप सिद्ध होने के बाद उसे जेल होते है और घर वापस आकर कुछ इस तरह से व्यथित होता है - होती अगर जीवित वो आज, तो आँगन में मेरे भी चहचाहट करती वो ! इस गांव में ना सही कहीं दूर दूसरे शहर में रह लेती, कम से कम इसी दुनिया में तो रहती वो | प्यार किया था या कोई गुनाह किया था, खुद अपने हाथों से मार दिया मैंने, अपनी लाड़ली बेटी को| ये समाज , धर्म-जाति सब कुछ दिखावे में आता है, ना धन है मेरे पास ना कोई रोजी रोटी का अता पता है! उस दिन मुझे उकसाने को हजारों का महकमा खड़ा था, मेरी अक्ल पर ना जाने क्या पत्थर पड़ा था! अपने घर की रोशनी को अंधेर में बदल दिया, साथ में किसी दूसरे के घर के चिराग को भी दुनिया से ओझल कर दिया | क्या पाया मैंने? अपने घर की हँसती खेलती हस्ती को मिटा दिया , साथ में किसी दूसरे के घर में भी मातम बिछा दिया| पड़ौसी,कौम,कुछ गांव वाले! ये लोग कौन से दूध के धुले