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Showing posts from June, 2017

आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख

शहरी गर्मी

​ये कविता उस स्थिति के बारे में लिखी गयी है| जब किसी नौकरी की तलाश में कोई बेरोजगार नौजवान युवा गांव से शहर का रुख करता है तो गर्मी में उसका हाल कुछ ऐसा हो जाता है- IMG credit- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:A_view_of_Road_Traffic_Chandagaur_to_New_Delhi_India_Highways.jpg गर्म मौसम और शहर का तापमान स्तर, यहां होता है माहौल औरों से इतर! लू के थपेड़ों से जलता बदन, काल के गाल में समा जाती है वो मदमस्त पवन ! वो सड़कों से उड़ती तेज  धूल , जैसे कोई चुभा रहा कोई गर्म शूल! आँखें पथरा गयी हैं  मंजिल की तलब में , सब जगह घूम रहा हूँ  मैं बेमतलब में! प्यास के मारे गला सूख गया है, पानी का ना कोई अता पता है! प्रदूषण की कालिख चेहरे पे लग रही है, आज आसमान से भी मानो आग बरस रही है! जहाँ नीम पीपल के वृक्ष थे, वहां अब मकान खड़े हैं ! जो 2-4 पेड़ भाग्यवश बच गए थे , आज वो भी बिल्कुल शांत खड़े हैं! कुछ कीकड के पेड़ बेज़ार खड़े हैं, लोग तो उसकी बनावटी छाँव में भी लगातार खड़े हैं! आँखें टोह रहीं हैं मंजिल की तलाश, सुबह से नहीं मिला सही दिशा में निकास! राहों की पहेली उलझती जा रही है, हर एक गली के बाद एक जैसी ग

ऑनर किलिंग!

​ऑनर किलिंग की घटनाएं हमारे देश में आये दिन होती रहती हैं, जिसके बाद के दृश्य को मैंने अपनी कविता के माध्यम से प्रदर्शित किया है| यह कविता लड़की के बाप के ऊपर आधारित है ,जिसमें लड़की का बाप अपनी बेटी सहित उस लड़के की हत्या कर देता है | आरोप सिद्ध होने के बाद उसे जेल होते है और घर वापस आकर कुछ इस तरह से व्यथित होता है - होती अगर जीवित वो आज, तो आँगन में मेरे भी चहचाहट करती वो ! इस गांव में ना सही कहीं दूर दूसरे शहर में रह लेती, कम से कम इसी दुनिया में तो रहती वो | प्यार किया था या कोई गुनाह किया था, खुद अपने हाथों से मार दिया मैंने, अपनी लाड़ली बेटी को| ये समाज , धर्म-जाति सब कुछ दिखावे में आता है, ना धन है मेरे पास ना कोई रोजी रोटी का अता पता है! उस दिन मुझे उकसाने को हजारों का महकमा खड़ा था, मेरी अक्ल पर ना जाने क्या पत्थर पड़ा था! अपने घर की रोशनी को अंधेर में बदल दिया, साथ में किसी दूसरे के घर के चिराग को भी दुनिया से ओझल कर दिया | क्या पाया मैंने? अपने घर की हँसती खेलती हस्ती को मिटा दिया , साथ में किसी दूसरे के घर में भी मातम बिछा दिया| पड़ौसी,कौम,कुछ गांव वाले! ये लोग कौन से दूध के धुले