Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2017

हिंसक-अहिंसा

अभी जैसा आप सबको पता है देश में एक गंभीर समस्या चल रही है , उस समस्या का अभी तक कोई समाधान नही मिल पा रहा

रोज हम अखबारों में सैनिकों के शहीद होने की खबर पढ़ते हैं ऐसी खबर पढ़कर मेरे अंदर बहुत उथल पुथल होती है समझ नहीं आ रहा आखिर ये रुकने का नाम क्यों नहीं ले रहा उसी व्यथा को मैंने कुछ शब्दों के माध्यम से लिखा है शायद कुछ लोगों को आपत्ति भी हो मेरे शब्दों पर मगर क्षमा चाहूँगा स्पष्टवादी हूँ -





बड़े शौक से लोग पढ़ते हैं और नसीहत देते हैं 

शांतिप्रियता मनुष्यता का प्रमाण है !

ऐसे शांति पक्षधरों को आज स्पष्ट शब्दों में बोलूंगा 

राजनीति , कूटनीति , इतिहास सारे पन्ने खोलूंगा !
खैर राजनीति तो कल परसों की कहानी है 

मगर सिंधु घाटी की ये सभ्यता तो वर्षों पुरानी है 

जब जब शांति की शरण में कोई गया था

तब तब उसकी उसकी हस्ती को शत्रु निगल कर गया था!

एक बार गौर करो इतिहास पर ऐसी अनेकों कहानी हैं !

तुम खोलो तो सही महाभारत  का विवरण

वो पांडवों के शांति प्रस्ताव का प्रकरण 

दुर्योधन समस्त राज हथियाने चला था 

भगवान कृष्ण को भी बंदी बनाने चला था !



इतिहास पढो तुम चक्रवर्ती सम्राट का 

जो खेल खेलता था शत्रुओं के विनाश का 

सुदूर दे…

मेरे अंतर्मन का बेनाम नगर

​वो मेरे अंतर्मन के बेनाम नगर में 

अमुक स्थान से निकलती संकरी राहों से गुजरने के बाद 

एक आवास श्रेणी है !

वहां कोई अज्ञात लोगों का पूरा समूह छिपा है ,

हाँ!एक दो नहीं हैं ,उनका तो पूरा झुंड है पूरा का पूरा !

शान्ति से रहें तो भी ठीक है ,

मगर वो अशिष्ट जन कोलाहल करते हैं

मैं ठहरा लाचार , निर्बल उनके सामने ,

आखिर अकेला प्राणी पूरे झुंड से कैसे लड़ाई करेगा!

वैसे एक नहीं हैं वो लोग 

मगर अच्छा होता अगर वो समूह में एक होते 

विचारधाराएं, परिकल्पनाएं , मार्ग, अभिलाषाएं सब एक होते 

मस्तिष्क - नगर में जाने के मार्ग ना अनेक होते !

दुर्भाग्य कहूँ या फिर मन की पिपासा

हाँ! सारी त्रुटियां मन ने ही तो की हैं ,

क्या जरूरत थी अंतर्मन - आवास श्रेणी में इतने रिक्त स्थान बनाने की ?

अब देख लो अज्ञात लोग अवैध कब्जा करके काल सर्प की भांति कुंडली मार के बैठे हैं !

फिर मैं विचार करता हूँ 

अच्छा ही तो है , जो यहां अनेकों रहते हैं 

वरना इतने बड़े रिक्तस्थान पर कोई

विशाल , वीरान , भुतहा खण्डहर होता !

जिन्न, छलावा और राक्षस ये सब यहां घर कर लेते 

उनके दुष्प्रभाव से शायद मैं भी कोई दानव होता !

अब मन पर प्रश्न चिन्ह लगाना छोटे मुंह बड़ी बात ह…

आत्मविश्वास

बहुत बार जीवन में लगातार असफलताएं मिलती हैं और हम इतने हतोत्साहित हो जाते हैं कि समझ नहीं पाते आखिर अब करना क्या है !

नकारात्मकता हम पर हावी होने लगती है ऐसे में किसी की कोई बात समझ नहीं आती फिर भी हमारे पास खुद को उत्साहित करने का मौका होता है जिससे हम काफी हद तक नियंत्रण पा सकते हैं वो है आत्मविश्वास !

कुछ ऐसे ही उद्देश्य से मैंने ये कविता लिखी है इसलिए शीर्षक देखकर भ्रमित नहीं होना----

निराशा , हताशा कृष्ण मेघ के समान 

परिधि में आच्छादित करेंगी,

उपहास तिरस्कार और लोक लाज सब व्यर्थ में 

उलझाकर विचारों में कल्पित   करेंगी

 मगर वीर! तुम बढ़े चलो 

इतिहास नया तुम गढ़े चलो !

ये समस्त विश्व एक जंजाल है 

यहां दानव शक्तियां विकराल हैं 

क्योंकि घोर कलियुग का ये काल है !

वीर!तुम निष्ठावान बनो, तुम धैर्यवान बनो 

वीर !तुम सत्यवादी बनो , तुम आशावादी बनो !
ये समस्त मनुज कंगाल हैं 

अज्ञान के बेताल हैं मगर 

तुमको कोई भ्रमित करे ,

भला क्या किसी की मजाल है?

मार्ग में बाधा सहस्रों खड़ी हैं 

जाने कितनी कंटक बबूल पड़ी हैं ,

हृदय को बना लो 

अभी ना जाने कितनी विफलताएं प्रतीक्षा में खड़ी हैं !

वीर ! तुम भयभीत मत हो 

विपदा से अधीर मत …

अंतिम दृश्य भाग -९

एक बड़ी सी कॉलोनी के बाहर लम्बा सा लोहे का जालीदार दरवाजा है और उसपे बैठे हुए दो बीमार से चौकीदार उनकी शायद शक्ल ही ऐसी है बेचारे सुबह से शाम तक गाड़ियों के नम्बर नोट करते हैं कभी कोई रुकता नहीं तो गाड़ी के पीछे उड़ती धुल भी खा लेते हैं ,क्या करें नौकरी है साहब महीने के अंत में दस हजार रूपये मिलेंगे तब जाकर घर के पांच सदस्यों के लिए रोटी का इंतजाम होता है !

खैर मैं भी क्या गेट पर ही अटक गया 😁😁 चलो आगे बढ़ते हैं एक गली कट रही है गेट से सीधे १०० मीटर चलने के बाद साथ में गली के बगल में एक छोटा सा पार्क है जिसमें २०-२५ छोटे बड़े बच्चे खेल रहे हैं यही कोई 6-7 बड़े लड़के वॉलीबॉल खेल रहे हैं

बाकि 2-3 बेचारे खड़े देख रहे हैं दरअसल बात यह है कि मन तो उनका भी बहुत है खेलने का मगर उनकी उम्र उनके आड़े आ रही है सारे लड़के उन्हें छोटू बोलकर खेल देखने को बोल देते हैं कभी कोई मौका ही नहीं देता अब इन पागलों को कौन समझाए क्रिकेट की पिच पर 17 साल का सचिन २९साल के बॉलर की तेज गेंद पर छक्का मारने में देर नहीं लगाता था !





खैर छोड़िये वो देखिये वहां पार्क के दूसरे कोने पर कुछ सीट्स लगी हैं जिनमे से एक सीट पर शक्तिप्रसाद …

बोधकथा 4- बालक ध्रुव

आज बोधकथा के क्रम में आज मैं फिर से एक बोधकथा लेकर आया हूँ जो मैंने पहले की भांति स्कूल में सुनी थी -
पुरातन काल की बात है किसी राज्य में एक राजा रहता था , राजा का नाम उत्तानपाद था और राजा की दो पत्नियां थी पहली पत्नी का नाम सुनिती था और दूसरी का नाम सुरुचि था !

सुरुचि की संतान का नाम उत्तम था और सुनिती के पुत्र का नाम ध्रुव था उसकी उम्र 5 वर्ष थी , राजा को दोनों रानियों में से सुरुचि अधिक प्रिय थी और सुनिती को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था !

एक बार की बात है ध्रुव अपने पिता की गोद में खेल रहा था , तभी सुरुचि उसे खेलता देख लेती है और ईर्ष्या के कारण वो ध्रुव को गोद से उतारकर उत्तम को बैठा देती है , अब छोटा बच्चा ध्रुव शिकायत करता है कि मुझे क्यों उतार दिया आपने ?

तो सुरुचि तिरस्कार से कहती है "तुम राजा की गोद में तो बैठ नहीं सकते हां भगवान के पास जाओ सिर्फ वो ही तुम्हे अपनी गोद में बैठा सकते हैं "

ध्रुव रोता हुआ सीधा अपनी माँ सुनिती के पास जाता है

सुनीति उसे दुलारती है समझाती है कि बेटा जिद्द नहीं करते जब उत्तम वहाँ नहीं रहेगा तब तुम बैठ जाना मगर ध्रुव कहाँ मानने वाला था वो लग…

Selfishness

Truth is that you were right 

Unknowingly  I blamed you 

Actually I was selfish ,
Yes 

Unluckily, overthinking was my mistake and  I was wrong 

 When I had alot expectation 

And looked at you 

Because I became so agressive .

Focused , self dependent and  you are strong 

And I pushed you 

To become partner of crime 

And now I am being offensive .

I made mistakes , fault was mine 

My poetic feelings were like unmelodious song 

And I forced you 

To complete that mismatched rhyme

Cz I was so foolish .

Fine "I can't be alone " that problem was mine

 But I had to become selfish because life is long 

And I convinced you 

To become a supporter of mine 

Because I was so selfish .
©Confused Thoughts

बोधकथा 3- तुलसीदास

नमस्कार दोस्तों ,

कैसे हैं आप सभी , जैसा की मैंने अपनी पहले एक पोस्ट में बताया था कि बोधकथा का क्रम प्रत्येक रविवार को ऐसे ही चलता रहेगा , बस तो आज के क्रम में मैं आपको एक छोटी सी कथा सुनाने जा रहा हूँ जो मैंने स्कूल के दिनों में सुनी थी -



एक गांव में सामान्य सा लड़का था जिसका नाम था तीर्थंराम , पढ़ाई लिखाई में कोई ख़ास लगाव नहीं था तो घर वालों ने जल्दी ही उसकी शादी एक विदुषी कन्या से करा दी , जिसे पढ़ाई लिखाई का बहुत अच्छा अनुभव था क्योंकि उनके घर का माहौल वेद पुराण से गुंजित हुआ करता था मगर जब उन्होंने देखा की ससुराल में लोगों को इन सब कामो में दिलचस्पी नहीं है तो उन्हें बड़ा अजीब लगा मगर उन्होंने कभी घमंड नहीं किया कि मैं सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी हूँ इस घर में , तीर्थराम साधारण ग्रामीण था ,

अब नयी नयी शादी हुई थी वो भी रूपवती के साथ तो उसका ध्यान घर पर कुछ ज्यादा ही रहता था वो सारा दिन घर पर ही व्यतीत कर लेता था , पत्नी से इतना ज्यादा मोहित था कि एक पल भी उसे अपनी नजरों से दूर नहीं होने देता था , अब जैसा हम सबको पता है सावन के महीने में नयी ब्याहली बहु को मायके जाना होता है बस इसी तरह तीर्थराम…