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एक से लेकर शून्य तक! विचार

 संसार में कहीं भी एक को महत्व नहीं दिया गया है, वो एक हमेशा से अधूरा रहा है,  जब तक उसके साथ दूसरा कुछ जुड़ नहीं जाता है। ब्रह्माण्ड की बात करें तो चीजें दो, तीन, पांच अथवा सात रही हैं। ये सब वैचारिक मदांधता है जिसमें "मैं अकेला" जैसे शब्द आ सकते हैं अथवा कोई बड़ा योगी जो उस एक का प्रयोग शून्य प्राप्ति के लिए कर रहा है। ~ #ShubhankarThinks
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आधी उम्र तो सोचने में जा रही है

 पहले आधी से ज्यादा जिंदगी सोचने में लगा दी, अब सदमे में हैं लोग कि जिंदगी व्यर्थ जा रही है| सबकी चाहत होती है दिक्कतें ना हो कभी, मुश्किलें हैं तभी तो आसानी समझ आ रही है! कोई कमाता है इतना की खपत भी नहीं है, कहीं रोज़ी रोटी जुटाने पूरी उमर जा रही है। घुमा फिरा के चीजें जटिल बन गई हैं, वरना जीने की कला तो सरलता रही है। जहां हंस बोलकर वक़्त भी काटा जा सकता था, वहां नफरतों की पूरी फसल आ रही है! सब जानते हैं कि दुःख सब दिमागी उपज हैं, फिर भी चिंता है कि डायन खाये जा रही है। भीड़ दौड़ रही है बहुत कुछ पा लेने को, भीड़ खाली हाथ धरती से चली जा रही है। ~ #ShubhankarThinks

देश में कुछ लोग बस इम्यूनिटी बढ़ा रहे हैं

 शायर शायरी छोड़कर भाषण बना रहे हैं, खिलाड़ी खेल छोड़कर रोडीज में जा रहे हैं अभिनेता अभिनय छोड़कर राजनीति में आ रहे हैं राजनेता नेतागिरी छोड़कर अभिनय दिखा रहे हैं पत्रकार पत्रकारिता छोड़कर धारावाहिक दिखा रहे हैं। मंत्री जी रोटी छोड़कर सरकारी नौकरी खा रहे हैं, अस्पताल पैसे छोड़कर जिंदगी खा रहे हैं। कौन मर रहा है, किसी को क्या फ़र्क पड़ता है, अब तो ड्रग्स लेने वाले बस सुर्खियों में आ रहे हैं। बच्चे किताब छोड़कर स्मार्टफोन चला रहे हैं, मास्टर जी वॉट्सएप की मदद से नौकरी बचा रहे हैं। स्थिति विचित्र है अगर थोड़ा भी ध्यान दिया जाए, सुखी वही हैं जो इम्यूनिटी बढ़ा रहे हैं। ~ #ShubhankarThinks

रिश्तों के मध्य तरलता

 भावनाएं अत्यन्त आवश्यक होती हैं रिश्तों के मध्य तरलता बनाए रखने के लिए, वरना टूट जाते है मजबूत से मजबूत जोड़ भी अगर उनके बीच सूखा घर्षण हो। ~ #ShubhankarThinks