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आओ बैठो थोड़ी देर

 बैठो कुछ देर अकेले आख़िर कब तक भागोगे ऐसे ही, यात्रा कभी समाप्त होगी नहीं, तुम्हें ही रुक कर आराम करना होगा। जब इतनी दूर चल लिए तो अब आओ बैठो थोड़ी देर, ये गठरी जो तुमने बेवजह लादी हुई है कंधे पर उतार के रख दो किसी किनारे पर, कब तक स्वयं को बोझ से दबाते रहोगे, थोड़ा देर ठहरो देखो क्या भरा है इस गठरी में, कहीं तुम कंकड़ पत्थर तो भर कर नहीं घूम रहे हैं, अरे पागल ये तो पड़े ही हुए हैं सब जगह तुम क्यों इन्हें लाद कर फिर रहे हो। सब संसार की फिक्र तुम ही लिए बैठे हो, कभी थोड़ी देर खुद का हाल चाल भी तो पूछो। क्या पता तुम्हें तुम्हारे बारे में फिक्र करने की सबसे ज्यादा जरूरत हो। तुम सुन कहाँ रहे हो अपनी, तुम चले आ रहे हो सबके अनुसार सबके प्रभाव में सबको देखकर। कभी देखो खुद को वो चाहता है कि विश्राम हो,  वो नहीं चाहता कि तुम कठिन बन जाओ, वो चाहता है कि सब काम सरलता से निपट जायें तो बोझ हल्का रहेगा। लेकिन तुम सुनते कहाँ हो? तुम तो अपनी विशेषता साबित करने में खप गए हो। किसे साबित करके दिखाना चाहते हो! क्या तुम जानते हो कि तुम भी हो इस दुनिया में? तुम्हारा भी वजूद है। अभी समय है आओ बैठो कुछ देर, बैठो ख
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आख़िरी दिन !

  फिर एक आख़िरी दिन सब ऐसा ही होगा जैसे पहले दिन से था, तुम होगे जब अपनी अंतिम सीढ़ी पर, साँस तैयार होंगी एक बार बाहर जाने के बाद  हमेशा के लिए आज़ाद हो जाने के लिए। तुम देखना अपने आस पास अगर कुछ क्षण रहें होश के तुम्हारे पास, अगर मृत्यु करे थोड़ा विलंब और तुम देख पाओ उसके आने के संकेत। तब देखना , सूरज निकलेगा उतनी ही गर्मी के साथ, हवा बहेगी अपनी रफ्तार में मस्त मगन, आसमान रहेगा तब वही नीले रंग का। पानी बहता जाएगा नदियों में, समंदर में, पहाड़ खड़े होंगे अपने विशाल स्वरूप में। फिर देखना एक बार इस संसार को, जहाँ आज भी दौड़ रहे हैं लोग इधर से उधर, आज भी बोझ लेकर सब भागे चले जा रहे हैं। आज भी किसी के पास साँस लेने भर की फुरसत नहीं है। आज भी पैसे के पीछे पागल हुई है दुनिया। आज भी कोई लड़ रहा है कोई गिड़गिड़ा रहा है किसी के सामने, आज भी कोई गुस्से से आग बबूला हुआ है किसी छुट पुट सी बात पर। फिर याद करना अपने पुराने दिन जब तुम भी ये सब में उलझे हुए थे, फिर देखना एक बार राह में कि मृत्यु बस आती ही होगी। फिर देखना अपने बैंक अकाउंट चेक करके,  देखना कितनी जमीन तुम्हारे नाम लिखी है, देखना अपने दोस्त परिवार व

मौसम बदले जीवन बदले, तुम फिर फिर अपने गीत सुनाना

जीवन है तो मौसम हैं, मरने के बाद बस एक मौसम रहेगा। फिर कभी नए नए मौसम देखने का मौका ना रहेगा। जीवन है तो आयेंगे उबासी भरे दिन, कभी बसंत महोत्सव कभी पतझड़ कभी बरसाती काली रातें। तुम चलते रहना अपनी राह, चाहे कोई भी हो। तुम बदल मत लेना चलने का ढ़ंग सिर्फ़ इसलिए  क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारे साथ गलत कर रही है। तुम रुक मत जाना देखकर कि कितना आसान है सब यहाँ, जहाँ तुम्हारे लिए सब कुछ उपलब्ध हो बिना किसी कठिनता के। तुम बहक मत जाना सुख देखकर, रखना याद की ये केवल एक मौसम है बदल जायेगा, तुम मन मत बना लेना सबसे कट जाने का इसलिए कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती हुई है, तुम ख़ुद से बचकर मत भागना इसलिए कि तुम में कमियाँ बहुत हैं। तुम कोई बोझ मत लाद लेना, अपने कंधे पर की तुम्हारे बिना ये सब काम कोई और ना करेगा। तुम होना खड़े किसी रास्ते पर, देखना ऊपर आसमान में और देखना फिर अपने शरीर को, कोई फ़र्क नहीं है तुम में और इस खुले आसमान में। तुम ऐसे चलना जैसे कोई राजा चलता है, ऐसे बोलना जैसे राजा बोलते हैं। तुम राजी मत हो जाना किसी के गुलाम बनने को, तुम देना सबको जितना दे सको, देखना मत मुड़कर पीछे की तरफ, राजा देते हैं

एक दिन थम जाएगा सब और तुम तुम ना रहोगे।

एक दिन सब थम जायेगा, तुम रुकोगे जब अपनी दौड़ से थक कर, तुम देखोगे कितना खाली है सब, कितना खोखला रह गया वह सब जिसे मैं भर रहा था इतने सालों से। इतना सब भर लेने के बाद भी खालीपन आख़िर कहाँ है? तुम उस दिन जानोगे जैसे व्यर्थ ही दौड़े तुम,  तुम्हारे सपने, इच्छा सब पूरे होने के बाद भी फिर फिर बड़े होते जा रहे हैं, जो सपने पूरे हुए उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ, खालीपन बरकरार है पूरा का पूरा। तुम्हें लगेगा जैसे तुम्हें ठग लिया किसी ने, जो सब तुम दौड़ दौड़ कर भर रहे थे दोनों हाथों में, अब जाने क्यों ढ़ीली पड़ गईं दोनों मुट्ठी, कुछ इच्छा ना रही अब पकड़ बनाने की, तुम जान रहे हो कि सब मुक्त रहें तो ज्यादा अच्छा है वरना बहुत झंझट हैं पकड़ कर रखने में। तुम होश में पहली बार जान रहे हो कि शरीर घट रहा है, हर दिन हर पल हर क्षण, मौत हर क्षण खड़ी है साथ ही, तुम पूरे होश में स्वीकार कर पाते हो अपनी मृत्यु का सत्य भी, फिर कठिनाई नहीं लगती यह स्वीकार करने में कि मैं भी करोड़ों लोगों के जैसा ही हूँ,  जो मेरी तरह यहाँ आये थे रहे यहां पर और फिर किसी अगले क्षण चले गए खाली हाथ सब यही छोड़कर। मैं विशेष नहीं हूँ बहुत सामान्य हूँ, तो

छोड़कर भागने से पहले सोचना की शुरुआत कहाँ से हुई!

जब जब तुम खड़े हो किसी मोड़ पर, जब तुम्हारा मन तुम्हें चौराहा बनाकर हैरान कर दे। जब तुम्हें लगे कि मैं ठग लिया गया हूँ, जब तुम्हें अपने रास्ते के अलावा सारे रास्ते फायदेमंद लगें। जब तुम्हारा मन कहे कि बचा ले खुद को जितना बचा सके, वरना ठगी हो जाएगी तेरे साथ, जब तुम्हारे पांव उखड़ने लगें और घूमने लगें दूसरे रास्तों की ओर। तब बैठना कुछ क्षण, एक लंबी साँस लेना और धीरे धीरे छोड़ना, आँखें संसार से हटाकर लगा देना अपने अंदर, याद करना कि शुरू क्यों किया मैंने, क्या वजह रही जो मुझे चुनना पड़ा यह रास्ता? तब तुम जानोगे की यात्रा कितनी रोमांचक रही, तुम निकले ही यात्रा करने के लिए थे, फिर यह फ़ायदा नुकसान बीच में कब घुस गया? क्या अर्थ है इस बात का कि तुम चले किस राह पर, रास्ते चार हों या एक, सब एक जैसे ही तो हैं! यात्रा जारी है तुम्हारी, यही तो महत्वपूर्ण है चाहे रास्ता जो भी हो, जब तुम निकल आये इतने आगे तक किसी राह पर तो पार कर जाओ पूरा रास्ता एक बार, फिर चलना जिधर मन चाहे नए रास्ते पर, यों बार बार बीच रास्ते से भाग जाना तुम्हें भगौड़ा बना देगा। ये छोड़कर भागने की आदत घुस जायेगी तुम्हारी नस नस में, तुम भाग

मुसाफ़िर हूँ यारो ! विचार

ठहर जाओ ऐसे जैसे हमेशा से थे ही वहीं, गुजर जाओ ऐसे जैसे कभी वहाँ थे ही नहीं| ~ #ShubhankarThinks

विस्तार अगर हो तो वृक्ष जितना हो !

विस्तार वृक्ष जितना हो तो फिर ठीक है, वृक्ष की छाया रहती है सदा जैसे, दो चार लोग बैठे तो अच्छा लगता है उसे भी, मगर ऐसी कोई इच्छा भी नहीं कि कोई रहे पास हमेशा। ख़ुशी मिलती है उसे जब बच्चे खेलते हैं उसके अगल बगल में, ख़ूब झूमता है सब पत्तों को लेकर साथ में, जब कोई नहीं रहता तो उखड़ नहीं जाता है अपने स्थान से, व्याकुल नहीं होता है कि बच्चे आज खेलने नहीं आये, उसे तीव्र इच्छा नहीं होती कि उस पर समाज ध्यान दे कि वो सबको कितनी छाया शीतलता दे रहा है निःस्वार्थ भाव से। वो खड़े होकर चार लोगों से यह नहीं कहता कि मैं इतना विशाल हूँ,  इतनी गहरी जड़ें हैं, मेरी शाखा गगन चूम रही हैं। आपने सुना नहीं होगा किसी वृक्ष को यह कहते हुए की इस व्यक्ति को मैं छाया नहीं दूँगा इसने मेरी शाखा काट ली थी। द्वेष, घृणा उसने जाने ही नहीं कभी तभी तो इतना विशाल हो पाया, वरना रह जाता कहीं खरपतवार की भीड़ में,  जहाँ झुंड से होती उसकी पहचान। विस्तार हो तो वृक्ष जैसा करना,  वरना रखे रखना खुद को किसी सुंदर गमले में छाया ना सही कम से कम सुंदरता बढ़ा सकोगे किसी के घरौंदे की। मत बन जाना कोई बिन पत्तों का पेड़  जिस पर ना फल आये ना फूल आ

पूरे खर्च हो जाओ ! विचार

 नया रखोगे कहाँ ज़नाब अगर पहले से भरे पड़े हो? कहीं ख़र्च हो लो, कुछ तो ख़ाली जगह बनाओ। ~ #ShubhankarThinks

सबको मुक्त रखें| विचार

हमारी अधिकतम जीवन ऊर्जा नियंत्रण में समाप्त हो जाती है,  आप लोगों को, चीजों को, परिस्थिति को, व्यवस्था को अनेकों उपाय से नियंत्रित करना चाहते हो।  ये प्रयास पूरे जीवन भर होता है, नियंत्रण कभी पूर्ण नहीं हो पाता है मगर आप स्वयं के लिए क्रोध, घृणा, दुख, अहंकार और मानसिक अवसाद अवश्य उत्पन्न कर लेते हो।  फिर एक दूसरी यात्रा प्रारंभ हो जाती है, जो वासना आपने दूसरों को नियंत्रित करने के चक्कर में स्वयं के लिए बना ली हैं, अब आप उन सबको भी नियंत्रित करने में लग जाते हो।  इस प्रकार से आप अपने ही जाल में स्वयं फंस कर रह जाते हो। ~ #ShubhankarThinks

फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा!

फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा,  जब आपको दो और दो चार कहने में हिचक नहीं होगी।  आप लंबी सांस भरके उन सबके मुँह पर कह दोगे कि,  पाँच और छः का नाटक आपको मुबारक, मैंने जाना है कि दो और दो चार होते हैं।  उस दिन आपको यह डर नहीं रहेगा कि अगर मैं अकेला पड़ गया तब क्या होगा,  तब आपको पहली बार दिखाई पड़ेगा कि आसमान इतना बड़ा कैसे है,  मेरी जहाँ तक नज़र है सब जगह दिखाई दे रहा है,  आप देखोगे कि कैसे सूरज डूब रहा है सचमुच में,  अब ये कोई सुनी हुई सौंदर्य कविता की बात नहीं रही।  आप जानोगे कि हवा दिखती नहीं है फिर भी गुजर रही है तुमसे छूकर,  आप देख पाओगे कि जरा सी हवा चलने पर नाचने लगते हैं पेडों पर लगे हुए पत्ते।  आप जानोगे की एकांत अब अकेलापन नहीं है,  मनुष्यों की भाषा के अलावा भी जीव जंतुओं की आवाजें शोर कर रही हैं,  अब आप जानोगे कि शांति प्रकृति में है ही नहीं  तो फिर उसे प्राप्त करने के प्रयास सब व्यर्थ ही हैं।  अब आप पाओगे कि एलईडी की रोशनी में सब चकाचौंध हो गया है,  इसलिए आप बत्ती बन्द करके देखने लगते हो चाँद और तारे।  एक दिन आप देखोगे सब वैसा, जैसा वो है,  आप पाओगे कुछ भी नहीं बदला मगर सब बदल गया। 

स्वतंत्र होने का एक और भ्रम ! विचार

 किसी विचार को मानने के बाद, किसी व्यक्ति के साथ पूर्ण सहमति होने के बाद अथवा किसी धर्म को मानने के बाद मिली परम स्वतंत्रता भी खूंटे से बँधी लंबी रस्सी में जकड़ी हुई आज़ादी है। आपको यह भ्रम हो सकता है कि आप पूर्ण आज़ाद हो गए हो आपको खूंटी के चारों तरफ गोल गोल घूमकर पूरा विश्व दिखाई दे सकता है, मगर आपकी सोच का दायरा उस खूँटी से बाहर नहीं जा  सकता है। खूँटी वास्तव में है नहीं आपने यह माना ही हुआ है कि आप खूँटी से बंधे हुए हो, आप इतने लाचार हैं कि स्वंय को बिना बांधे रह नहीं पाते हो।  स्वयं को परतन्त्र बनाने के लिए अनेकों मार्ग खोज रखे हैं, एक भ्रम के अंदर दूसरा भ्रम आप पूरा मैट्रिक्स बनाकर खुद को फंसाये हुए हो। ~ #ShubhankarThinks

कुछ ना बनने में संभावनाएं ! जीवन

 कुछ बन जाने में एक चुनाव है, जिसके बाद इंसान कुछ और नहीं बन पाता, मगर कुछ ना बनने में, सब कुछ बन जाने की संभावना होती है। #ShubhankarThinks

विचार ! 16 April

जो खुद के साथ कभी बुरा ना करे, केवल वही दूसरों के लिए कुछ अच्छा कर सकता है। ~ #ShubhankarThinks

आँखों से जब पर्दा हटाया ! जीवन ! कविता

बंद आँखों से "मैं" का जब पर्दा हटाया, कहने और करने में बड़ा फ़र्क पाया। सब समझने के वहम में जीता रहा "मैं", सच में समझ तो कुछ भी नहीं आया। रहा व्यस्त इतना सच्चाई की लाश ढोने में, कि जिंदा झूठ अपना समझ नहीं आया। कारण ढूँढता रहा हर सुख दुख में, अकारण मुझे कुछ नज़र नहीं आया। ढूँढता रहा सब जगह कुछ पाने की ललक से, जो मिला ही हुआ है वो ध्यान में ना आया। फँसता गया सब झंझटों में आसानी से, सरलता को कभी अपनाना नहीं चाहा। झूठ ही झूठ में उलझा हुआ पाया, आंखों से जब जब पर्दा हटाया। ~ #ShubhankarThinks

जीवन के सागर में डूबना! विचार

  जीवन अगर सागर है तो शरीर किनारे से कर पाता है स्पर्श सतह को,  भाव दो चार डुबकी लगाने तक सीमित रह जाते हैं,  आत्मा डूब सकती पूरा का पूरा,  आत्मा तैर सकती है सागर के अंतिम छोर तक।  ~ #ShubhankarThinks

जीने के साथ मरने के भी इंतेजाम किये जायें

जीने के प्रयास जितने भी हो तमाम किए जाएं,  खत्म होने के लिए पहले से इंतजाम किये जाएं।  जोड़ा जाए जिन्दगी को सभी तरकीबों से, वहीं ख़ुद को मिटा देने वाले काम किए जाएं। बूंद बूंद समेटा जाए तजुर्बा सब किस्म का, वहीं कतरा कतरा ख़ुद को बे नाम किया जाये।  भिड़ जाओ हर मुश्किल से बेवक्त यूं ही, कभी फुर्सत में ख़ुद से ही संग्राम किए जाएं।  बाहरी जरूरत में बन जाओ पैसों के इबादी मगर अंदर के सारे रकबे बे-दाम किये जायें।  मतलब ढूंढ़कर तुम करते ही हो सब कुछ,  कुछ बेमतलब के भी दो चार काम किये जायें।  अंदर बहुत दबा लिया ख़ुद को समझदारी में आकर,  अब पागलपन के सब लम्हे खुलेआम जिये जाएँ।  बहुत जी ली जिंदगी दूसरों को दिखाने के मकसद से,  अब कुछ किस्से जिन्दगी के गुमनाम जिये जाएँ।  दिमाग रख लेता है हिसाब हर एक चीज का,  अब हिसाब किताब सारे बेलगाम किये जायें।  जीना की तरकीबें जितनी भी हों सारी अपना लो,  मगर साथ में मरने के भी पूरे इंतेजाम किये जायें।  ~ #ShubhankarThinks

जिंदगी खुलकर जीने की शर्त

 खुलकर ज़िंदगी जीना बड़ा आसान काम है, बस शर्त ये है की आप पागल हो जाएं! ~ #ShubhankarThinks

जिंदगी और दौड़ भाग ! 02 March 21

 कितना भी संवार लो कुछ गड़बड़ी तो रहेगी, और दौड़ने से तो केवल हड़बड़ी बढ़ेगी! #ShubhankarThinks

पौधे पर फूलों का ना खिलना

जैसे किसी बाग में पौधों पर फूल ना खिल सकें तो हवा, पानी, खाद, बीज कई कारण हो सकते हैं परंतु इन सबमें से मुख्य कारण माली का सजग ना होना माना जायेगा, ऐसे ही अगर किसी बच्चे के चेहरे पर अगर फूल ना खिल रहे हों, उसके भीतर से ऊर्जा उछाल नहीं मार रही तो इसका पूरा दोष माता पिता को दिया जाना चाहिए। ~ #ShubhankarThinks

रस कोई निर्झर बह रहा है

रस कोई रग-रग से निर्झर बह रहा है, उद्गम से अनभिज्ञ फिर भी चित्त शांत रह रहा है। हैं जो अनगिनत प्राचीर दिन दिन गिर रही हैं, कुछ अध गिरी दीवार पर से बह रहा है। कल तक भू गर्भ में विस्मृत फंसा था, वो बीज अब बाहें फैलाए बढ़ रहा है। किए गए थे आयोजन जिस घोंसले में, आज वो घर चहचहाहट से भर रहा है। नाचता है रोम रोम संगीत धुन पर, गीत कोई प्रकृति में बज रहा है। किन्हीं संकरे पर्वत के दल में, जैसे बह रहा जल, कल कल के क्रम में, ऐसा कोई नाद मन में हो रहा है। कुछ रह रहा है शेष फिर भी, शेष सब में खो रहा है, है कोई दलदल भी भीतर, "मैं" वहीं कहीं धंस रहा है, बस रहा सब कुछ ही भीतर, कुछ रोज रोज खो रहा है। ~ #ShubhankarThinks

लोग जी कम रहे हैं, बता ज्यादा रहे हैं

 लोग ज़िंदा हैं ऐसे जैसे एहसान जता रहे हैं, जी कम रहे हैं, सबको बता ज्यादा रहे हैं। उधारी में लेते हैं सांस भी सोच समझकर, जैसे बची हुई सांसों से किश्त पटा रहे हैं। ख़ुशी के लिए किए बैठे हैं, हसरतों की डाउनपेमेंट, पजेशन के लिए कमबख्त हंसी बचा रहे हैं। दो तीन की गिनती में बुरे फंस गए हैं, ख़ुद के गणित में ही ख़ुद को फंसा रहे हैं। जी रहे हैं दस प्रतिशत बड़े रूखे हुए मन से, बाकी नब्बे प्रतिशत बच्चों के लिए बचा रहे हैं। गले में कुछ भी फांस लेना प्रथा बन गई है, आंखें मूंदकर सभी ये किए जा रहे हैं। दुख में रहना एक बहादुरी का काम है, घूंट घूंट इस जहर को पिए जा रहे हैं। मूल काट रहे हैं थोड़ा थोड़ा करके, लोग पत्तों की सजावट में जान लगा रहे हैं। लोग जी कम रहे हैं, दिखा ज्यादा रहे हैं।। ~ #ShubhankarThinks

प्रेम लिखने जितना सरल विषय नहीं है! कविता

 प्रेम को जितना भी जाना गया वो बहुत कम जाना गया, प्रेम को किया कम लोगों ने और लिखा ज्यादा गया। ख़ुशी मिली तो लिख दिया बढ़ा चढ़ाकर, मिले ग़म तो बना दिया बीमारी बनाकर। किसी ने बेमन से ही  लिख दी दो चार पंक्ति शौकिया तौर पर, कोई शुरुआत पर ही लिखता रहा डुबा डुबा कर। कुछ लगे लोग प्रेम करने ताकि लिखना सीख जाएं, फ़िर वो लिखने में इतने व्यस्त कि भूल गए उसे यथार्थ में उतारना! हैं बहुत कम लोग जो ना बोलते हैं, ना कुछ लिखते हैं उनके पास समय ही नहीं लिखने के लिए, वो डूबे हैं प्रेम में पूरे के पूरे। वो जानते हैं की यह लिखने जितना सरल विषय है ही नहीं इसलिए वो बिना समय व्यर्थ किए कर रहे हैं उस हर पल जीने की। उन्हें दिखाने बताने, समझाने जैसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं दिखती,वो ख़ुद पूरे के पूरे प्रमाण हैं,  उनका एक एक अंश इतना पुलकित होगा कि संपर्क में आया प्रत्येक व्यक्ति उस उत्सव में शामिल हुए बिना नहीं रह पायेगा। वो चलते फिरते बस बांट रहे होंगे, रस ही रस।  ~ #ShubhankarThinks

जीवन में मस्तिष्क की उपयोगिता ! विचार

 जीवन में मस्तिष्क का उपयोग इतना किया जाना चाहिए, जितना आटे में नमक! जिसकी अधिकता और अनुपस्थिति दोनों नुकसानदायक हैं। ~ #ShubhankarThinks

सत्य एवम् यथार्थ ! विचार

 सत्य और यथार्थ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, यथार्थ प्रामाणिकता है सत्य की। ~ #ShubhankarThinks

दुःखी होना ! विचार

 दुःखी होना मनुष्य का एक स्वाभाविक लक्षण है, और एक ही अवस्था के लिए बार-बार दुःखी होना मानसिक दुर्बलता का। ~ #ShubhankarThinks

सपने देखना! विचार

 कोई रात को सोते हुए बन्द आंखों से सपने देखता है, कोई दिन में आंखें खोलकर भी सपनों में सोया है, और जागा हुआ व्यक्ति कभी सपने ही नहीं देखता है। #ShubhankarThinks

Consious vs Unconscious ! Thought 26 Dec

 The basic difference between consciousness and unconsciousness is to have faith in By-products, not in goals. ~ #ShubhankarThinks

ख़ुशी की प्रेरणा कोई बच्चा ही होगा! कविता

समझदार हसेंगे तभी कि  पहले कुछ अच्छा ही होगा, फूटकर निकली ख़ुशी की प्रेरणा  तो कोई बच्चा ही होगा। कोई जरूरत से ज्यादा मिठाई बांट दे, तो सावधान यहां कुछ गच्चा ही होगा। कड़वाहट भरा तन- मन जिसका भी, वो फल अभी भी कच्चा ही होगा! तीखी बातें करे और चलता बने जो, तो जान लेना वो कोई सच्चा ही होगा, बिना एहसान मदद कर दे जो किसी की, वो आदमी कोई अच्छा ही होगा। नाचकर उभर आए, झूमता गिर पड़े जो वो वैरागी या फ़िर पीपल का पत्ता ही होगा। होश में चल रहा जो कछुए की चाल से, वो आदमी संकल्प का पक्का ही होगा। ~ #ShubhankarThinks

विचार ! स्थिरता | 23 Dec 20

 अगर आप शरीर हैं तो स्थिरता केवल मृत्यु के उपरांत आ सकती है, उसके पहले या तो आप बढ़ रहे हो या फिर दिन प्रतिदिन घट रहे हो। ~ #ShubhankarThinks

विचार! वास्तविकता को उपेक्षित करना ! 23/12/2020

 वास्तविकता को उपेक्षित करने से प्राप्त सुख क्षणिक है, यह कृत्य, स्वयं के भविष्य के साथ कपट करने जैसा है। ~ #ShubhankarThinks

पुष्पों से लदा पौधा और इंसान

 पुष्पों से लदा हुआ एक पौधा, फलों से लदा हुआ एक पेड़, और पारिवारिक जिम्मेदारी से लदा हुआ इंसान! सब बोझ के तले झुक ही जाते हैं, और कभी तनकर खड़े नहीं हो पाते। ~ #ShubhankarThinks

संतोष, चापलूसी

 संतोष कर लेना, स्वयं को सुखी रखने की एक मात्र सिद्धि है। जीवित व्यक्ति की प्रशंसा करना, चापलूसी को श्रेणी में आता है।

साहित्य में चरित्रों की अतिश्योक्ति

किसी भी विषय की अतिश्योक्ति में लिखे गए कथा, उपन्यास एवम् कविताएं, वर्तमान पाठकों को रस देते हैं और भविष्य को दे जाते हैं भ्रम एवम् मिथ्या तथ्य। ~ #ShubhankarThinks #sahitya #katha #upanyaas

जीवन का अस्तित्व

 मनुष्य के अंदर प्रेम का स्थान और भूमि की उर्वरता का सुरक्षित रहना, भविष्य में जीवन के अस्तित्व की पुष्टि करता है।

हालात एक जैसे कभी ना रहे

 ख़्वाब हो सकते हैं कितने भी हसीन, ऐसा कभी होता नहीं है कि सब सही रहे।  दो चीजें अलग हैं तो वो अलग ही रहेंगी, हो भी कैसे सकता है कि तनातनी ना रहे। सब जद्दोजहद में कि खुशियां हो मेरे हिस्से, ग़म का साया मेरे इर्दगिर्द कहीं ना रहे। कभी रौनक हुई तो कभी लंबे सन्नाटे मगर हालात एक जैसे तो कभी ना रहे। सांस छोड़ने से मौत और सांस आए तो जिंदगी, ध्यान से देख लें अगर तो ये डर कभी ना रहे। कुदरत ने बनाए हैं दुनिया में अंधेरे उजाले, ताकि मनोरंजन में कभी कोई कमी ना रहे। ~ #ShubhankarThinks

एक से लेकर शून्य तक! विचार

 संसार में कहीं भी एक को महत्व नहीं दिया गया है, वो एक हमेशा से अधूरा रहा है,  जब तक उसके साथ दूसरा कुछ जुड़ नहीं जाता है। ब्रह्माण्ड की बात करें तो चीजें दो, तीन, पांच अथवा सात रही हैं। ये सब वैचारिक मदांधता है जिसमें "मैं अकेला" जैसे शब्द आ सकते हैं अथवा कोई बड़ा योगी जो उस एक का प्रयोग शून्य प्राप्ति के लिए कर रहा है। ~ #ShubhankarThinks

सरल जीवन की प्राप्ति

 सरल जीवन को प्राप्त होना, इस भौतिक संसार में कठिनतम कार्य है। ~ #ShubhankarThinks

State of joyfulness

 You become happy when outside circumstances come in your favor, You become joyful when none of the outside circumstances affect you anymore. ~ #ShubhankarThinks #joyfull #happy #quote

आधी उम्र तो सोचने में जा रही है

 पहले आधी से ज्यादा जिंदगी सोचने में लगा दी, अब सदमे में हैं लोग कि जिंदगी व्यर्थ जा रही है| सबकी चाहत होती है दिक्कतें ना हो कभी, मुश्किलें हैं तभी तो आसानी समझ आ रही है! कोई कमाता है इतना की खपत भी नहीं है, कहीं रोज़ी रोटी जुटाने पूरी उमर जा रही है। घुमा फिरा के चीजें जटिल बन गई हैं, वरना जीने की कला तो सरलता रही है। जहां हंस बोलकर वक़्त भी काटा जा सकता था, वहां नफरतों की पूरी फसल आ रही है! सब जानते हैं कि दुःख सब दिमागी उपज हैं, फिर भी चिंता है कि डायन खाये जा रही है। भीड़ दौड़ रही है बहुत कुछ पा लेने को, भीड़ खाली हाथ धरती से चली जा रही है। ~ #ShubhankarThinks

रिश्तों में हिसाब किताब! विचार

 आपसी लेन देन की बड़ी सुंदर व्यवस्था हैं, रिश्ते! जब तक इनमें हिसाब लगाना शुरू ना किया जाए। ~ #ShubhankarThinks

देश में कुछ लोग बस इम्यूनिटी बढ़ा रहे हैं

 शायर शायरी छोड़कर भाषण बना रहे हैं, खिलाड़ी खेल छोड़कर रोडीज में जा रहे हैं अभिनेता अभिनय छोड़कर राजनीति में आ रहे हैं राजनेता नेतागिरी छोड़कर अभिनय दिखा रहे हैं पत्रकार पत्रकारिता छोड़कर धारावाहिक दिखा रहे हैं। मंत्री जी रोटी छोड़कर सरकारी नौकरी खा रहे हैं, अस्पताल पैसे छोड़कर जिंदगी खा रहे हैं। कौन मर रहा है, किसी को क्या फ़र्क पड़ता है, अब तो ड्रग्स लेने वाले बस सुर्खियों में आ रहे हैं। बच्चे किताब छोड़कर स्मार्टफोन चला रहे हैं, मास्टर जी वॉट्सएप की मदद से नौकरी बचा रहे हैं। स्थिति विचित्र है अगर थोड़ा भी ध्यान दिया जाए, सुखी वही हैं जो इम्यूनिटी बढ़ा रहे हैं। ~ #ShubhankarThinks

रिश्तों के मध्य तरलता

 भावनाएं अत्यन्त आवश्यक होती हैं रिश्तों के मध्य तरलता बनाए रखने के लिए, वरना टूट जाते है मजबूत से मजबूत जोड़ भी अगर उनके बीच सूखा घर्षण हो। ~ #ShubhankarThinks

चापलूसी एवम् प्रशंसा ! विचार

 जीवित व्यक्ति की प्रशंसा करना, चापलूसी को श्रेणी में आता है।   ~ # ShubhankarThinks

छोटे बड़े की समस्या !

 ये उसकी समस्या है, जो खुद को तुमसे बड़ा समझ रहा है, समस्या तुम्हारे अंदर है अगर कोई तुम्हारे सामने ख़ुद को छोटा महसूस करे। ~ #ShubhankarThinks

ज्ञान और प्रवचन

 ज्ञान में से प्रवचन को घटा दिया जाए तो केवल व्यवहारिकता शेष रह जाती है। अगर प्रवचन में से ज्ञान को हटा दिया जाए तो शेष रह जाते हैं बड़े बड़े बोल। ~ #ShubhankarThinks

जीवन को जीना ! विचार - 30 Aug

 आधे से ज्यादा जीवन भविष्य की चिंता में बिताया, बचा हुआ समय भूतकाल के पश्चाताप में बिताया! अब बुढ़ापे में भी मरने से उनको डर लग रहा है,  क्योंकि जीवन को उन्होंने अभी जिया ही कहां है? #ShubhankarThinks

विचार | २४ अगस्त

 किसी की बात पर ध्यान नहीं देना मानसिक सक्षमता का सूचक है, किसी की बात नहीं सुनना मदांधता का प्रमुख लक्षण है।  #ShubhankarThinks

वास्तविकता कोई समस्या नहीं है

 लोगों के लिए "वास्तविकता" एक जटिल समस्या है तेज आंखों की रोशनी इसे देख नहीं पाती, कानों की श्रवण शक्ति इसे ग्रहण नहीं करती और बुद्धि इसे स्वीकार नहीं करती है। कभी कभी पूरी आयु लग जाती है यह समझने  में कि समस्या वास्तविकता में नहीं है। #ShubhankarThinks

वैचारिक स्वतंत्रता का मूल्य है एकाकीपन #स्वतंत्रता दिवस

 ये दुनिया बांटी हुई है दो पक्षों में, एक अच्छाई का पक्ष, एक बुराई का, एक साफ़ पक्ष, एक गंदा पक्ष एक अनपढ़ का पक्ष, एक बुद्धि जीवी पक्ष, एक अमीर पक्ष, एक गरीब पक्ष, एक वाम पक्ष, एक दक्षिण पक्ष एक धार्मिक पक्ष, एक नास्तिक पक्ष अगर आपको सामाजिक रहना है तो आपको  एक पक्ष में खुद को ढालना होगा, किसी एक को पूर्ण सहमति देनी होगी और दूसरे पक्ष को विपक्ष मानना होगा। इनमें से किसी भी पक्ष का हिस्सा बनने के  लिए आपको देनी होगी अपनी स्वतंत्र सोच  और विवेक की बलि। यही होगी पराधीनता के इस समर में पूर्ण आहुति। अन्यथा वैचारिक स्वतंत्रता का मूल्य है एकाकीपन। #स्वतंत्रता_दिवस #Happy_Independence_day #ShubhankarThinks

जिंदगी में ख़ुशी मिली तो कम लिखा

 लोगों ने मजबूरी लिखी, गरीबी लिखी, हालात में पिसती हुई जवानी लिखी, लोगों ने बेवफ़ाई लिखी, सूनापन लिखा और मोहब्बत में बिछड़ने का ग़म लिखा मगर मिली ख़ुशी जब उनको तो कम लिखा। ~ #ShubhankarThinks

मुश्किलें रास्ते में आई बहुत हैं

मजबूती से रखा है एक एक क़दम, वरना अड़चनें रास्ते में अाई बहुत हैं। ज़मीन पर गड़ाए रखना नजरें अपनी, हरियाली के बीच में खाई बहुत हैं। बस काम की बात से मतलब रखो तुम, वरना किताबों में बातें बताई बहुत हैं। गर्दिश में भी कैसे उजाले ढूंढने हैं, मुश्किलों ने तरकीब सिखाई बहुत हैं। सोच समझकर करो दिल्लगी किसी से, ज़माने में मोहब्बत को लेकर लड़ाई बहुत हैं।  सबक दूसरों की गलती से भी लेते चलो तुम, ख़ुद से सब कुछ सीखने में कठिनाई बहुत हैं। ~ #ShubhankarThinks

जीवों के साथ जीव जैसा व्यवहार

"सभी जीवों को जीवित मान कर उनके साथ जीव जैसा व्यवहार करना।" एक अत्यन्त कठिन संकल्प है परन्तु प्रकृति में स्थिरता बनाने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ~ #ShubhankarThinks

किसान और मंदी

फसल का कोई दाम ना मिलने पर, जब चलता है ट्रैक्टर हरी भरी फसल के ऊपर, तो हैरो के नीचे कट जाती हैं, हरी सब्जियां और उसके साथ ही कट जाते हैं, जमा पूंजी और मेहनत भी और मिट्टी में पिसकर खाद बन जाता है उसके भरोसे और हिम्मत का। फिर किसान घर ढोकर ले जाएगा! कर्ज, गरीबी और लाचारी की फसल। ~ #ShubhankarThinks

Thought of the day #9 June 2017

वक्त बड़ी तेजी से चल रहा है, आपके पास दो विकल्प हैं ,  या तो ठहर कर जीवन का आनंद लो, या फिर वक्त की चाल में चाल मिला लो| अगर बीच का रास्ता चुना तो, ना काम बचा पाओगे, ना पहचान बना पाओगे| पढ़ने गये कविता हम शेर-ओ-शायरी के दौर में, मेरी पंक्तियाँ कुचल गयीं, वाहवाही के शोर में| ~ #ShubhankarThinks

समस्याएं हैं इसलिए जीवित हैं हम

अगर व्यक्ति स्वयं को व्यवस्थित कर ले तो वह अपने जीवन की आधी समस्याएं समाप्त कर लेगा। क्योंकि अब वह स्वयं कोई समस्या नहीं है, बची हुई समस्या बाहरी हैं, अगर सभी लोग उसके जैसे बन जाएं तो बची हुई समस्या भी समाप्त हो जायेंगी। अब ऐसे संसार में सभी लोग ऊब जाएंगे, समय व्यतीत नहीं होगा तो अपने अपने सिर दीवार में मारने लग जाएंगे। कुछ लोग स्वयं को इस भौतिक संसार से मुक्त होने के लिए करेंगे आत्म हत्या। समस्याएं हैं तभी लोग जीवन के मूल्य समझ रहे हैं और उन्हें जीवित रहने का लालच है। ~ #ShubhankarThinks